विदेश नीति की दिशा पर पुनर्विचार चाहिए, Foreign Policy Direction Needs Course Correction

अमेरिका-इज़राइल और ईरान का युद्ध हिन्द महासागर की लहरों पर सवार हो कर हमारे दरवाज़े तक पहुँच चुका है। श्रीलंका के तट से 44 नौटिकल मील दूर अमेरिका की पनडुब्बी द्वारा ईरान के युद्धपोत ‘डेना” को  टॉरपीडो से डुबोए जाने की घटना के बाद से भारत की भूमिका को लेकर देश और विदेश में बहुत चर्चा, और आलोचना, हो रही है। यह जहाज़ हमारा महमान था और विशाखापटनम में बहुराष्ट्रीय नौसेना अभ्यास में हिस्सा लेने के बाद लौट रहा था कि उसे डुबो दिया गया। लेकिन हम तो इस युद्ध से तब से जुड़े हुए हैं जब से प्रधानमंत्री मोदी ने इज़राइल की यात्रा की थी। इस यात्रा की समाप्ति के कुछ ही घंटों के बाद ईरान पर हमला कर दिया गया। इज़राइल के विदेश मंत्री ने बताया है कि प्रधानमंत्री मोदी को इसके बारे जानकारी नहीं दी गई। यह कूटनीतिक धोखा है। एक तरफ़ तो कहा जा रहा है कि भारत और इज़राइल बैसट फ्रैंड्स है तो दूसरी तरफ़ हमारे प्रधानमंत्री को अंधेरे में रख कर उनकी स्थिति असुखद बना दी गई है।

अमेरिकी- इज़राइली हमले में ईरान के आयतुल्लाह खामेनेई मारे गए। उनके शासन काल में ईरान का समाजिक, राजनीतिक और आर्थिक पतन हुआ। पर यह उनका मामला है। वह उस देश के राष्ट्राध्यक्ष थे जिसके साथ हमारे प्राचीन सम्बंध हैं और पड़ोसी देश है। भारत सरकार ने तत्काल कोई शोक प्रकट नहीं किया जबकि अमेरिका और इज़राइल बहुत गलत परम्परा डाल रहे है। ऐसे में कोई भी राष्ट्राध्यक्ष सुरक्षित नहीं रहेगा। कल को अगर रूस युक्रेन के राष्ट्रपति जेलेंस्की पर हमला करता है तो क्या वह भी जायज होगा? भारत सरकार की चुप्पी पर चारों तरफ़ उठ रहे सवालों के पाँच दिन बाद विदेश सचिव विक्रम मिसरी को ईरानी दूतावास भेजा गया जहां उन्होंने शोक पुस्तिका पर हस्ताक्षर किए और संवेदना प्रकट की।पर किसी भी राजनीतिक नेता ने संवेदना प्रकट करने की औपचारिकता नहीं निभाई। न ही भारत सरकार ने ईरान में बमबारी में मारी गईं 165 स्कूली बच्चियों की मौत पर ही शोक प्रकट किया। बच्चों की मौत तो कूटनीतिक मजबूरी से उपर होनी चाहिए थी। दिसंबर 2014 में जब आतंकवादियों ने पेशावर के सैनिक स्कूल में 132 बच्चों की हत्या कर दी थी तो प्रधानमंत्री मोदी ने टैलिफोन पर नवाज़ शरीफ़ से बात कर घोर शब्दों में इसकी निन्दा की थी। यही संवेदना ईरान में मिनाब में 165 बच्चियों की हत्या के बारे क्यों नहीं अपनाई गई?

फिर ईरानी युद्धपोत ‘डेना’ को डुबोने का मामला भड़क गया। वह जहाज़ हमारे पानी में नहीं था। वह तो श्रीलंका के पानी में भी नहीं था। उन्होंने खुद को बचाने का जो डिसट्रैस सिग्नल भेजा वह भी श्रीलंका को भेजा जिसने 130 में से 32 नौसैनिकों को बचा लिया। हमारी कोई ज़िम्मेदारी नहीं बनती पर तकलीफ़देह सवाल ज़रूर उठतें हैं। एक, क्या भारत को जानकारी थी कि हमारे पड़ोस में अमेरिका की परमाणु पनडुब्बी शिकार की खोज में घूम रही है? अगर हमें मालूम नहीं था तो और भी चिन्ता की बात है क्योंकि हम तो ख़ुद को हिन्द महासागर का संरक्षक मानते है। विदेश मंत्री जयशंकर ने माना है कि, “हाँ, हम हिन्द महासागर में सुरक्षा प्रदान करने वाला देश हैं। पर सागर अलग हक़ीक़त है। दूसरे देश भी यहां मौजूद हैं”। वह तो खुद को काट रहें है। दूसरी बात है कि यह युद्धपोत और उसके नौसैनिक हमारे महमान थे। ईरान ने कहा भी है कि ‘हम भारत के महमान थे’। पूर्व नौसेनाध्यक्ष एडमिरल अरुण प्रकाश का कहना है कि यह “हमारी क्षेत्रीय विश्वसनीयता और रणनीतिक स्वायत्ता को धक्का है”, और वह कहतें हैं कि हमारी यह नैतिक जिम्मेदारी बनती है कि हम उस जहाज़ के बारे आवाज़ उठाएँ जो हमारा महमान था। पर जयशंकर ने ‘सागर की हक़ीक़त’ कह कर मामला ख़त्म कर दिया। पूर्व विदेश सचिव विवेक काटजू की टिप्पणी है कि “क्या अमेरिका को नाराज़ करने की सम्भावना हमारे कदमों को रोक रही है”? यही सवाल आज सारे देश में गूंज रहा है।

लेकिन अभी अमेरिका का अहंकार ख़त्म नहीं हुआ था। खाड़ी में युद्ध से तेल की क़ीमतों में भारी उछाल आ गया है। भारत तेल का बड़ा आयातक है।अमेरिका के वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट ने इस पर यह विचित्र बयान दिया है कि, “भारत बहुत अच्छा एक्टर रहा है। हमने उन्हें रूस से तेल लेना बंद करने को कहा तो उन्होंने ऐसा कर दिया। दुनिया में तेल की अस्थाई कमी को देखते हुए हमने उन्हें 30 दिन के लिए रूसी तेल ख़रीदने की अनुमति दी है”। अंग्रेज़ी के शब्द ‘वेवर’ अर्थात् छूट का भी इस्तेमाल किया गया।  भारत सरकार पहले तो चुप रही फिर अनाम सरकारी सूत्रों के हवाले से बताया गया कि हम अपने फ़ैसले खुद लेते हैं पर ‘अनुमति’ या ‘छूट’ के बारे सीधा जवाब नहीं दिया।अमरीकी अधिकारी कह रहें हैं कि भारत के फैसले नई दिल्ली में नही, वाशिंगटन में लिए जा रहें हैं पर नई दिल्ली शांत रही।  कई महीनों से अमरीकी अधिकारी हमारी बेइज़्ज़ती कर रहें हैं पर हम जवाब नहीं दे रहे। लोग हैरान हैं और सोशल मीडिया में यह सवाल बार बार उठ रहा है कि क्या हमारी रणनीतिक स्वायत्तता बनावटी है? यह तो नया डानल्ड ट्रम्प का साम्राज्यवाद हम पर थोपने की कोशिश हो रही है। इसका डट कर मुक़ाबला होना चाहिए। सच्चाई है कि हमने सस्ता रूसी तेल लेना कम कर दिया और महँगा तेल ले रहें हैं। यह भी समाचार है कि नाराज़ रूस अब सस्ता तेल नहीं देगा।

एक समय था जब दुनिया में हमारी आवाज़ गूंजती थी। हम कमजोर थे पर फिर भी अपनी बात कहने से गुरेज़ नहीं किया था। अब यह निराली चुप्पी लोगों को चुभ रही है। हम युद्ध के मामले में तटस्थ रहें तो समझ आता है, पर जब सीधा हमें नीचा दिखाने की कोशिश की जाती है फिर हम शांत क्यों रहते हैं ?एनर्जी अर्थशास्त्री डा. अनस अलहजी ने लिखा है, “भारत जैसे महान देश को रूस से तेल लेने के लिए राष्ट्रपति ट्रम्प से अनुमति लेने की क्या ज़रूरत है…बहुत बुरी स्थिति है”। लंडन स्कूल ऑफ इकनॉमिक की चेलसी नगोक मिनह ने लिखा है, “भारत की प्रतिष्ठा ने कुछ ही महीनों में जो गिरावट आई है वह असाधारण है”। अब फिर अमेरिका के उपविदेश मंत्री क्रिस्टोफर लेंडों ने कहा है कि “ भारत के मामले में हम वही गलती नहीं दोहराएँगे जो 20 साल पहले हमने चीन के मामले में की थी। हम भारत के बाज़ार को विकसित नहीं होने देंगे ताकि भारत हमें ही पीछे न छोड़ दे”। इसे कहतें है कि बिल्ली थैले से बाहर आ गई है! बहुत कुछ समझ भी आ रहा है। हम पर दुनिया में सबसे अधिक 50% टैरिफ़ लगाया गया जबकि चीन हमसे भी अधिक तेल रूस से ख़रीदता है। अमेरिका हमारे उत्थान को ‘मैनेज’ करना चाहता है ताकि चीन की तरह हम एक दिन बड़ा प्रतिद्वंदी न बन जाऐं।  यही कारण भी है कि वह देश पाकिस्तान को इस तरह सर पर उठा रहा है। इसका यह भी मतलब है कि हमने इस युद्ध में चाहे एक साइड को चुन लिया हो, उस साइड ने हमें नही चुना।

संसद में विदेश मंत्री जयशंकर में  ‘भारत की गहरी चिन्ता’ और शान्ति की बात कही। पर इसमें नया क्या है? रूसी तेल के बारे अमरीकी विदेश मंत्री ने जो कहा है उस पर विदेश मंत्री ने सीधा जवाब क्यों नहीं दिया? उनके उपविदेशमंत्री की बदतमीज़ी का सीधा जवाब क्यों नहीं दिया गया? ईरान पर हमले से  चारों तरफ़ आर्थिक अफ़रातफ़री फैल रही है। देश में एलपीजी का संकट खड़ा हो गया है। सब से अफ़सोस की बात है कि जयशंकर का बयान संसद के उस नियम के अधीन दिया गया जिसमें उनसे विपक्ष सवाल नहीं पूछ सकता। सरकार कब तक सवालों से भागती रहेगी?  चाहिए यह कि प्रधानमंत्री फ़ोन उठा कर नेतन्याहू से कहें कि यह पागलपन और तबाही बंद करें। अगर हमारी नैतिक आवाज़ बंद हो गई तो हमारी विशिष्टता समाप्त हो जाएगी। ब्रिक्स में हमारे सिवाय सब देशों ने हमले का विरोध किया है। ग्लोबल साउथ के नेतृत्व का हमारा दावा कमजोर पड़ रहा है।

योरूप में ट्रम्प की नीतियों का विरोध शुरू हो गया है। विरोध का स्वर ऊँचा करने वालों में इंग्लैंड के प्रधानमंत्री कीर स्टामर्र भी हैं जिनके साथ ट्रम्प की ज़बरदस्त तू तू मैं मैं चल रही है जबकि दोनों देश घनिष्ठ सहयोगी रहें है। समय आगया है कि  दुनिया की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था अपनी विदेश नीति की दिशा पर फिर से गौर करें।‘‘रणनीतिक खामोशी’ कई मामलों में सही रहती है पर तब नहीं जब हमारे हितों पर आँच आ रही हो या हमारी संप्रभुता और आत्म सम्मान पर वार किया जा रहा हो। हमें अपनी आवाज़ फिर से बुलंद करनी है। जहां तक अमेरिका का सवाल है, उनके पूर्व विदेश मंत्री हैनरी किसिंजर के यह शब्द याद रखने चाहिए कि, “अमेरिका का दुष्मन होना ख़तरनाक हो सकता है, पर अमेरिका का दोस्त होना तो बिलकुल जानलेवा है”।

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About Chander Mohan 811 Articles
Chander Mohan is the grandson of the legendary editor of Pratap, Mahashya Krishan. He is the son of the famous freedom fighter and editor, Virendra. He is the Chief Editor of ‘Vir Pratap’ which is the oldest hindi newspaper of north west india. His editorial inputs on national, international, regional and local issues are widely read.