हर युद्ध का कोई मतलब होता है, कोई लक्ष्य होता है। हाल में रूस ने युक्रेन पर जो युद्ध शुरू किया है उसका मक़सद उस क्षेत्र पर क़ब्ज़ा करना है जिस में रूसी बोलने वाले लोग रहतें हैं और जो रूसी साम्राज्य का हिस्सा रहा है। अमेरिका ने भी जब जब विभिन्न देशों पर हमले किए तो इसका औचित्य समझाने की कोशिश की थी। वियतनाम पर हमला कम्युनिस्टों को ख़त्म करने के लिए किया। इराक़ पर हमला इसलिए किया गया क्योंकि, अमेरिका के अनुसार, सद्दाम हुसैन के पास सामूहिक विनाश के हथियार थे। सद्दाम मारा गया पर यह कथित हथियार नहीं मिले क्योंकि यह थे ही नही। अफ़ग़ानिस्तान पर हमला ‘आतंक को ख़त्म करने के लिए’ किया गया। हाल ही में वेनेज़ुएला पर हमला कर उनके राष्ट्रपति मदूरो को अमेरिका उठा लाया। औचित्य था कि वेनेजुएला अमेरिका में ड्रग्स सप्लाई करता है। पर ईरान पर युद्ध थोपने के वकत ट्रम्प ने कोई स्पष्ट लक्ष्य नज़र नहीं आता। यह नहीं कि ईरान से अमेरिका को कोई ख़तरा है। जून 2025 में ईरान के परमाणु संयंत्रो पर हमले के बाद ट्रम्प ने कहा था कि उनका परमाणु कार्यक्रम नष्ट कर दिया गया है। अब फिर कहा जा रहा है कि हम उनका परमाणु कार्यक्रम नष्ट करना चाहतें हैं। पहले कहने था कि वह ‘रिजीम चेंज’ अर्थात् सरकार बदलना चाहते हैं। ट्रम्प ने ईरान के लोगों से कहा भी था कि “अपने मुक़द्दर पर नियंत्रण करने का मौक़ा है”। अब कहा जा रहा है कि यह कोई लक्ष्य नहीं है। यह भी नहीं बताया जा रहा कि युद्ध का क्या अंत देखा जा रहा है?
ईरान में हमारे पूर्व राजदूत गद्दम धर्मेन्द्र का कहना है, “यह चकरा देने वाली बात है कि युद्ध के लक्ष्य के बारे स्पष्टता नहीं है। न ही स्पष्ट है कि वह इसे कैसे ख़त्म करना चाहतें हैं”? समझ नहीं आता कि ट्रम्प और नेतन्याहू की जोड़ी दुनिया को किधर ले जाना चाहती है। अगर आपको खामेनेई पसंद नहीं तो आप उन्हें हटाने के लिए हज़ारों ज़िन्दगियों को ख़तरे में डालने के लिए तैयार हो? 86 वर्ष का अयातुल्ला खामेनेई तो मारा गया। उनके रक्षा मंत्री, आर्मी चीफ़ समेत 40 कमांडर मार दिए गए हैं। पर कोई संकेत नहीं कि वहाँ ‘रिजीम चेंज’ होने वाला है या ईरान कमजोर पड़ गया है। उल्टा, खामेनेई की मौत के बाद उन्हें शहीद करार दिया गया है। शिया मुसलमानों के लिए शहादत सबसे बड़ी क़ुर्बानी है। उनके विरोधी भी सरकार के पीछे एक जुट हो गए हैं। युरोपियन कॉंसल ऑफ फारन अफ़ेयर्स की विशेषज्ञ ईसी गैरनमेयह ने कहा है, “खामेनेई की मौत एक युग का अंत है पर वही शासन व्यवस्था जारी है। ईरान की सेना और इस्लामिक रैवलयुशनरी गार्ड एकजुट हैं और सुरक्षा व्यवस्था पर उनका नियंत्रण है। वह अमेरिका और इज़राइल का मुक़ाबला करने के लिए दृढ़ संकल्प हैं”।
खामेनेई की मौत के बाद उस क्षेत्र में अमेरिका के ठिकानों और साथी देशों पर ईरान से हो रहे लगातार हमले बताते हे कि वह वेनेजुएला की तरह हथियार डालने को तैयार नहीं। उनके पास 3000 मिसाइल और हज़ारों ड्रोन है। जिस प्रचंडता से और जिस तेज़ी से वह बदला ले रहे हैं उससे पता चला है वह बिल्कुल तैयार थे। अमेरिका और इज़राइल दोनों इससे दंग रह गए हैं।
खामेनेई बहुत सखत और कट्टर शासक थे। किसी भी तरह का विरोध बर्दाश्त नहीं करते थे पर यह मामला ईरान के लोगों का है। डानल्ड ट्रम्प का नही। एक व्यक्ति को हटाना किसी युदद का मक़सद नहीं हो सकता। हमारे साथ भी रिश्ते खट्टे मीठे रहे। खामेनेई ने बाबरी मस्जिद गिराए जाने का भारी विरोध किया था। यदाकदा यहाँ ‘अल्पसंख्यकों की हालत’ पर टिप्पणी करते रहे। पर उन्हीं के समय चाहबहार बंदरगाह पर काम शुरू हुआ जिसके द्वारा हमें अफ़ग़ानिस्तान और केन्द्रीय एशिया गणराज्य तक पहुँचने का रास्ता मिल गया था। अमेरिका के दबाव में अब यह ठप्प हो गया है। इज़राइल के साथ हमारे सम्बंध बहुत अच्छे हैं। मुसीबत के समय,जैसे कारगिल का युद्ध , वह बहुत काम आतें है। पर मुझे यह कहने में तनिक भी संकोच नहीं कि नेतन्याहू एक निर्दयी शासक हैं जिन्होंने अपनी राजनीति के लिए गाजा में 60000 लोग मरवा दिए हैं। और अब जिनकी नीति ने सारे क्षेत्र को अस्थिर कर दिया है। अक्तूबर में इज़राइल में चुनाव है। सब यह देख कर किया जा रहा है।
खाड़ी और मध्य पूर्व के देशों में आराम से रह रहें लाखों भारतीयों की ज़िंदगी और आजीविका खतरें में हैं। भारत सरकार ट्रम्प और नेतन्याहू की गलत नीतियों का विरोध भी नहीं कर पा रही। अमेरिका और इज़राइल के हमले और ईरान के जवाब ने सारे मध्य पूर्व को अस्थिर कर दिया है जिसके बहुत बुरे परिणाम निकलने वाले हैं, विशेष तौर पर हमारे लिए। ईरान अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहा है वह पीछे नहीं हटेगा। मौत के बाद खामेनेई और बड़ी चुनौती बन गए हैं। वहाँ बदले की आग भड़क गई है। लंडन स्थित भारतीय पत्रकार सैयद ज़ुबैर अहमद ने कहा है, “जो खामेनेई अपने देश को भारी आर्थिक कठनाई,प्रदर्शनों और आंतरिक लड़ाई झगड़े के साथ चला रहे थे को अमेरिका और इज़राइल ने शहीद बना दिया”। यूनिवर्सिटी ऑफ लंडन के अली हाशिम ने भी कहा है, “अमेरिका और इज़रायल उनके नेतृत्व पर निशाना लगा रहें हैं पर इससे उनकी सरकार और मज़बूत हो सकती है”। उनकी हत्या के खिलाफ तेहरान की सड़कों पर लाखों प्रदर्शन कर रहें है। दुनिया भर में शिया और सुन्नी शोक में इकट्ठे हो गए हैं। ईरान ने कहा था कि अगर युद्ध शुरू किया गया तो यह सारे क्षेत्र में फैल जाएगा। यह अब क्षेत्रीय युद्ध का रूप ले रहा है।
इस वक़्त तक ईरान साऊदी अरब,यूएई, ओमान,कतर, बहरीन, ओमान, कुवैत सब पर ड्रोन और मिसाइल से हमले कर चुका है और कर रहा है। इन सब देशों में अमेरिका के अड्डे हैं। चारों तरफ़ अफ़रातफ़री मची हुई है। तेल की क़ीमतों में अभी से 10% का उछाल आ चुका है। गैस की आपूर्ति में रूकावट आने की सम्भावना है। होर्मुज के जल रास्ते को रोक कर ईरान ने तेल की सप्लाई में भारी रूकावट डाल दी है। मध्य पूर्व और खाड़ी के देश एक प्रकार से पश्चिम और पूर्व के देशों के बीच पुल हैं। उनके हवाई अड्डों को निशाना बनाया गया है। अंतराष्ट्रीय हवाई मार्ग बाधित हो गए हैं। हज़ारों वहाँ फँसे हुए हैं। हैरानी है कि दुबई को विशेष निशाना बनाया गया है।क्या इसका कारण है कि दुबई में ट्रम्प के परिवार का बड़ा निवेश है? कारण कुछ भी हो, दुबई को बड़ा धक्का पहुँचा है जिससे उभरने में बड़ा वक़्त लगेगा। यूएई को विशेष तौर पर हर तरफ़ से सुरक्षित जगह समझा जाता था। कोई टैक्स नहीं। कोई नहीं पूछता कि पैसा कहां से आया। ईरान ने हमला कर इस सुरक्षा की भावना पर सवालिया चिन्ह लगा दिया है। दूरगामी असर होगा। इन देशों के सिवाय जो देश सबसे अधिक प्रभावित हुआ है, वह भारत है।
1 मार्च को जिस दिन भारत और वेस्ट इंडीज़ के बीच क्रिकेट मैच था, एक मैसेज चारों तरफ़ भेजा गया कि ‘रूस-युक्रेन, पाकिस्तान- अफ़ग़ानिस्तान, इज़राइल-ईरान के बीच युद्ध चल रहा है पर हम लोकतांत्रिक शांतिमय भारत में सुरक्षित है। कोई चिन्ता नहीं, अगर है तो मैच जीतने की है’। मैच तो हम जीत गए पर यह मैसेज आंशिक रूप से ही सही है। एक, हम भी ओपरेशन सिंदूर के समय युद्ध झेल कर हटें हैं। दूसरा, यह लोग भूलते हैं कि इन देशों में हमारे 90 लाख हमवतन रहतें हैं जो घटनाक्रम से बहुत परेशान है। इनके परिवार जन और भी चिन्तित है। खाड़ी के देशों से हमारे लोगों ने 2024-25 में 135 अरब डालर घर भेजे थे।॰यह इससे पिछले साल से 14% अधिक है और बाहर से भेजे गए पैसे का 40% प्रतिशत बनता है। इससे हमारी अर्थव्यवस्था को मज़बूती मिलती है। हमारा 50% तेल इस क्षेत्र से आता है। 80-85% एलएनजी को खाड़ी के देशों से आयात किया जाता है। यह सब महँगा होगा और रूकावट भी पड़ सकती है। रूस से तेल लेना हम पहले ही अमेरिका के दबाव में रोक चुकें हैं।
अभी तक भारत सरकार ने इज़राइल और अमेरिका के हमले की आलोचना नहीं की है और न ही खामेनेई की मौत पर दुख प्रकट किया है।केवल कहा है कि घटनाक्रम पर ‘गम्भीर चिन्ता है’। ऐसा प्रतीत होता है कि हमने तटस्थता छोड़ दी है जबकि ईरान के साथ हमारे प्राचीन सम्बंध है और वह पड़ोसी देश भी है। ईरान के बाद सबसे अधिक शिया मुसलमान भारत में हैं। युद्ध शुरू होने से 40 घंटे पहले तक प्रधानमंत्री मोदी इज़राइल में थे। उनकी टाइमिंग को लेकर विपक्ष आलोचना कर रहा है। प्रधानमंत्री तब वहाँ थे जब युद्ध की तैयारी चरम पर होगी। क्या हमारे प्रधानमंत्री को नेतन्याहू ने इसके बारे जानकारी दी या उसी तरह अंधेरे में रखा जैसे पाकिस्तान ने कारगिल के बारे प्रधानमंत्री वाजपेयी के रखा था? पर अब प्रधानमंत्री को अपने ‘ब्रदर’ पर दबाव डालना चाहिए कि वह यह युदद समाप्त करें। हमारे लाखों लोग प्रभावित हो रहें हैं और उनकी सुरक्षा का सवाल है। उन्हें उस तरह वहाँ से नहीं निकाला जा सकते जैसे 1990 में कुवैत से निकाला गया था। हमारा अपना हित स्थिर पश्चिमी एशिया में है जिस में नेतन्याहू सबसे बड़े बाधक हैं। ऐसा बेमतलब, बेमक़सद का जुआ खेला गया है जिसमें कोई भी विजेता नहीं होगा। खेल का अंत कब और कैसे होगा यह भी कोई नहीं कह सकता। हमें नुक़सान ज़रूर होगा।