यह युद्ध का युग नही है, This Not Era of War

डवाइट डी.आइज़नहॉवर जो द्वितीय विश्वयुद्ध में योरूप में सुप्रीम कमांडर थे और बाद में अमेरिका के 34वें राष्ट्रपति बने ने कहा था, “मैं युद्ध से नफ़रत करता हूँ क्योंकि मैंने उसका अनुभव किया है। मैंने उसकी क्रूरता, निरर्थकता और मूर्खता देखी है”। आज जबकि एक और अमेरिकी राष्ट्रपति ने मध्यपूर्व में एक और युद्ध शुरू कर दिया है, आइज़नहॉवर के इन शब्दों की सार्थकता समझ आती है। ट्रम्प की मूर्खता की बात करने से पहले यह याद रखना चाहिए कि दुनिया में एक और युद्ध भी चल रहा है। चार साल पहले रूस ने युक्रेन पर हमला किया था। अनुमान है कि दोनों तरफ़ से मारे गए की संख्या 500000-600000 के क़रीब है। घायल लाखों में है। युक्रेन छोटा है इसलिए तबाही अधिक हुई है पर रूस का भी भारी नुक़सान हुआ है। क़र्ज़ा बहुत बढ़ गया है और इतने सैनिक हताहत हुए हैं कि भाड़े के सैनिक लेने पड़ रहे है। पर युद्ध का कोई अंत नज़र नही आता। पुतिन की मूर्खता ने भारी तबाही मचा दी है।

हम इस मामले में समझदार रहें हैं। हमारा इतिहास साक्षी है कि हमने दूर दूर तक अपना प्रभाव फैलाया पर युद्ध के बल पर नही। विचारों के बल पर हमने दुनिया को जीता था। आप्रेशन सिंदूर भी सीमित लक्ष्य के लिए था, हम पाकिस्तान में आतंकी इंफ़्रास्ट्रक्चर तबाह करना चाहते थे। यह हमने कर दिया। अगर दूसरे दिन पाकिस्तान जवाब न देता तो युद्ध पहले ही ख़त्म हो जाता। यहाँ कई लोग, जिन में भाजपा के समर्थक अधिक है, ने सरकार की आलोचना की थी कि इतनी जल्दी युद्ध क्यों बंद कर दिया? पर हमारी सरकार ने  समझदारी दिखाई। हम जानते हैं कि युद्ध क्रूर, निरर्थक और मूर्ख है इसलिए पाकिस्तान की प्रार्थना को तत्काल स्वीकार कर युद्ध विराम कर लिया।

1971 के युद्ध में हमने ज़रूर पाकिस्तान को दो टुकड़े कर दिए और बांग्लादेश बनवा दिया। पर जब लक्ष्य पूरा हो गया तो इंदिरा गांधी ने शिमला में ज़ुल्फ़िकार अली भुट्टो की बात मान ली। उनके 90000 सैनिक वापिस कर दिए और पश्चिम में विजय किया उनका क्षेत्र वापिस कर दिया क्योंकि हम लम्बे युद्ध में फँसना नहीं चाहते थे। हमारा लक्ष्य पूर हो गया था। मध्य पूर्व में वर्तमान युद्ध के बारे तो पता ही नहीं कि लक्ष्य क्या है? डानल्ड ट्रम्प को खुद नहीं पता कि लक्ष्य क्या है इसीलिए बार बार लक्ष्य बदल रहें हैं। हाँ, एक व्यक्ति ज़रूर है जिन्हें पता है कि लक्ष्य क्या है। इज़राइल के प्रधानमंत्री नेतन्याहू चाहते हैं कि युद्ध लम्बा चले। उनके राजनीतिक अस्तित्व के लिए उन्हें युद्ध चाहिए। पहले गाजा को तबाह किया। औचित्य था कि हमास ने 1200 इज़राइली नागरिकों का अपहरण कर मार डाला। हमास एक आतंकी संगठन है पर उस इज़राइल के बारे क्या कहा जाए जिसने बदला लेने के लिए गाजा में 70000 निरपराध लोगों को मार डाला? अस्पताल, स्कूल सब तबाह कर दिए। अभी भी प्यास नहीं बुझी। अब लेबेनान को तबाह करने में लगे हैं। कुछ पाठक मुझ से नाराज़ है कि मैं मध्य पूर्व में इज़राइल की नीति का विरोध कर कहा हूँ। उनका कहना है कि इज़राइल हमारा मित्र देश है। पर जब मित्र उन्मादी हो जाए तो दूरी बनाना ही समझदारी है।

नेतन्याहू के उकसावे पर ही ट्रम्प ने मध्य पूर्व में युद्ध शुरू करने की मूर्खता की है। उनका भी पुतिन जैसा अनुमान था कि युद्ध जल्द ख़त्म हो जाएगा। अब वह युद्ध ख़त्म करना चाहते हैं पर रास्ता नहीं मिल रहा। वह ‘विकटरी’ बता कर अमेरिका के लोगो को संतुष्ट करना चाहते हैं जहां 60% लोग इस फ़िज़ूल युद्ध के खिलाफ है। इसीलिए ‘विकटरी’ की परिभाषा बदलते जा रहे हैं। नुक़सान को जीत में बदलने पर माथापच्ची हो रही है। न्यूयार्क टाइम्स ने लिखा है कि कि ट्रम्प फ़ैसला नहीं कर पा रहे कि युद्ध जारी रखें या जीत का दावा कर पीछे हट जाएँ। ट्रम्प को घबराहट है कि संसद के मध्यावधि चुनावों में उनकी पार्टी की हार हो सकती है। युद्ध को लेकर ट्रम्प की बौखलाहट इतनी है कि उनका कहना है कि अमेरिका का मीडिया और बड़े समाचार पत्र चाहतें हैं कि अमेरिका युद्ध हार जाएँ!

इस बौखलाहट का बड़ा कारण है कि बिना लक्ष्य निर्धारित किए वह युद्ध की दलदल में कूद पड़े। जब युद्ध शुरू किया गया तो उन्होंने सोचा था कि कुछ ही दिनों में ख़त्म हो जाएगा और ईरान की राजनीतिक और सैनिक लीडरशिप बदल जाएगी। पर खामेनेई और बड़े कमांडरों की हत्या के बावजूद ईरान नहीं झुका। उल्टा उसके हमलों की तीव्रता बढ़ गई है। सभी खाड़ी के देश उसके हमले झेल रहे हैं और होर्मुज का जलमार्ग उसके नियंत्रण में है। वहाँ से वही जहाज़ निकल रहें हैं जिन्हें ईरान निकलने की इजाज़त दे रहा है। ट्रम्प का तब तक ‘विकटरी’ का दावा खोखला रहेगा जब तक होर्मुज नही खुलता। ट्रम्प अब साथी देशों से गुहार कर रहें हैं कि वह इस जलमार्ग को खुला रखने के लिए अपने युद्धपोत भेजें। अर्थात् वह युद्ध को आउटसोर्स करना चाहतें हैं पर कोई भी देश तैयार नहीं हुआ इसलिए ट्रम्प सब पर भड़क रहें हैं।

ईरान खुद तबाह हो रहा है पर आसपास तबाही मचाने की उसकी क्षमता कायम है। उनकी नीति प्रतीत होती है कि ‘हम तो डूबे हैं सनम तुम को भी ले डूबेंगे’। ईरानी वायुसेना और नौसेना तबाह हो चुकी है पर उसके पास 3000 मिसाइल और हज़ारों ड्रोन है जिन्हें पहाड़ों के नीचे सिलो में रखा गया है जहां अमेरिकी बम नहीं पहुँच सकते। वह महीनों लड़ सकते हैं जिसका अंदाज़ा अमेरिकी नेतृत्व को हो रहा है। अमरीकियों को भी अहसास हो रहा है कि वह फ़ालतू युद्ध में फँस गए हैं। राजनीतिक विश्लेषक जॉन मीकशेमर ने लिखा है, “हम यह संदेश दे रहें हैं कि हम मूर्खों का टोला हैं। हमने वह युद्ध शुरू कर दिया जो हम जीत नहीं सकते”। यह उल्लेखनीय है कि अमेरिका के उपराष्ट्रपति जेडी वैंस जो ट्रम्प के बड़े समर्थक रहें है, ने खुद को इस अभियान से अलग रखा हुआ है।

अमेरिका की सैन्य ताक़त की कमजोरी खाड़ी के देशों को ईरान के फ़ायर से बचाने में उनकी असफलता से पता चलती है। इन देशों ने अपनी ज़मीन पर अमेरिका के अड्डों की इजाज़त दी हुई है जो उनके लिए मुसीबत बन चुकें है क्योंकि अमेरिका के अड्डों के कारण उन पर ईरान लगातार हमले कर रहा है। अनुमान है कि यूएई पर 1800 मिसाइल हमले हो चुकें है। दुबई पर रोज़ाना हमले हो रहें हैं। इन देशों को मिली कथित अमरीकी सुरक्षा छतरी की अपर्याप्तता जगज़ाहिर हो चुकी है। अमरीकी दूतावासों पर हमले हो रहें है और अमरीकियों को वहाँ से निकाला जा रहा है। अमेरिका और इज़राइल के मुक़ाबले में ईरान बहुत मामूली ताक़त है पर वह अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहें है। उनका राष्ट्रवाद बहुत गहरा और सुदृढ़ है। मध्य पूर्व से रक्षा विशेषज्ञ डैनी सिटरोनविक बतातें हैं, “ईरान के पास जो कुछ है वह उन्होंने लड़ाई में झोंक दिया है …अधिक बमबारी से कुछ नहीं बदलेगा। तेल पर दबाव डाल कर वह समझतें हैं कि वह अमेरिका को युद्ध समाप्त करने के लिए मजबूर कर सकतें हैं”।

  हर चुनौती बमबारी से हल नहीं हो सकती। जंग की तपिश से सारी दुनिया प्रभावित है। हैरानी है कि अमेरिका ने अपने इतिहास से कुछ नहीं सीखा। वियतनाम में कम्यूनिस्टों को रोकने के लिए दखल दिया गया। विनाशकारी युद्ध में लाखों लोग मारे गए पर अमेरिका को दुम दबा कर वहाँ से भागना पड़ा। इराक़ और लीबिया में दखल दिया गया। सद्दाम हुसैन और गद्दाफ़ी को सता से हटा दिया गया पर दोनों देशों की हालत अराजक कर अमेरिका वहा से हट गया। अफ़ग़ानिस्तान से भी उसे भागना पड़ा। इन सब देशों की अपनी अपनी अलग संस्कृति है, व्यवस्था है जिस पर पश्चिम स्टाइल व्यवस्था लादी नहीं जा सकती।  न ही वह वेनेज़ुएला है जिस पर अमेरिका नियंत्रण कर सका।  दुनिया अमेरिका के आधिपत्य के स्वीकार करने को तैयार नहीं। अब तो पश्चिम के नाटो देश अमेरिका की बात मानने को तैयार नहीं। ट्रम्प की धमकियाँ बेअसर हो रही है। भारत पर भी दबाव आएगा पर हमें झुकना नहीं चाहिए। इस साल ब्रिक्स शिखर सम्मेलन भारत में हमारी अध्यक्षता में हो रहा है। जिसे ग्लोबल साउथ कहा जाता है, के देश हमें देख रहें हैं। ईरान पहले ही दबाव डाल रहा है कि भारत ब्रिक्स से ‘अमेरिका और इज़राइल कँ सैनिक हमले’ की निन्दा करवाए।

 सरकार ने ईरान से बात करनी शुरू कर दी है। देर आए दुरुस्त आए ! प्रधानमंत्री मोदी ईरान के राष्ट्रपति से बात कर चुकें हैं और विदेश मंत्री एस जयशंकर उनके विदेश मंत्री से लगातार बात कर रहें है। इसी का परिणाम है कि एलपीजी के दो टैंकर होर्मुज पार कर भारत पहुँच सकें हैं। पर दो दर्जन टैंकर अभी फँसे हुए हैं। पहले यह प्रभाव था कि हम एक तरफ़ झुक रहें हैं इसे सही किया जा रहा है। हमें तटस्थ रहना है। दुनिया भर में लोग इस युद्ध के विरुद्ध है। अमेरिका और इज़राइल बिल्कुल अलग थलग पड़ चुकें है। तेल की बढ़ती क़ीमतों नें इसे और अलोकप्रिय बना दिया है। प्रधानमंत्री मोदी ने युक्रेन युद्ध के बारे पुतिन को समझाया था कि ‘यह युद्ध का युग नही है’। यही बात उन्हें ट्रम्प और नेतन्याहू को समझानी चाहिए। 

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About Chander Mohan 811 Articles
Chander Mohan is the grandson of the legendary editor of Pratap, Mahashya Krishan. He is the son of the famous freedom fighter and editor, Virendra. He is the Chief Editor of ‘Vir Pratap’ which is the oldest hindi newspaper of north west india. His editorial inputs on national, international, regional and local issues are widely read.