लद्दाख क्यों बेचैन है, Why This Unrest In Ladakh

जलवायु कार्यकर्ता सोनम वांगचुक, जिनके जीवन से प्रेरित फ़िल्म 3 इडियटस बनी थी, रिहा होकर लेह लौट आएं हैं। उन्हें राष्ट्रीय सुरक्षा क़ानून (एनएसए) के तहत गिरफ़्तार किया गया था और जोधपुर जेल में रखा गया था। इस क़ानून के तहत किसी को अधिकतम 12 महीने हिरासत मे रखा जा सकता है पर सुप्रीम कोर्ट में गिरफ़्तारी की वकालत करने के बाद सरकार ने वांगचुक को 169 दिन के बाद रिहा कर दिया। जब उन्हें गिरफ़्तार किया गया तो बताया गया कि वह ‘राष्ट्र विरोधी गतिविधियों’ में संलिप्त है जिस बात से देश में शायद ही कोई सहमत हो। बहुत लोग तो उन्हें राष्ट्रीय ख़ज़ाना मानते हैं। और अगर वह वास्तव में राष्ट्र विरोधी गतिविधियों में संलिप्त थे तो छोड़ा क्यों गया? सारे मामलें से सरकार सही ढंग से नहीं निबटी और जो देश का एक प्रकार से सबसे शांत क्षेत्र था,लद्दाख, उसे बेचैन छोड़ दिया गया है। लद्दाख के बौद्ध और कारगिल के मुसलमान जो सदा एक दूसरे के विरोधी रहे हैं अब केन्द्र सरकार के खिलाफ एकजुट हो गए हैं। जिस उपराज्यपाल के समय वांगचुक को गिरफ़्तार किया गया था को तो अब बदल दिया गया है। नए उपराज्यपाल विनय कुमार सकसेंना ने रिहाई का स्वागत करते हुए कहा है कि वहाँ ‘आंदोलन और हिंसा की कोई जगह नहीं’। जहां तक हिंसा का सवाल है मैं उनकी बात से बिलकुल सहमत हूँ। एक सभ्य समाज में हिंसा की कोई जगह नहीं होनी चाहिए पर शांतिमय आंदोलन पर आपत्ति क्यों हो? आंदोलन करना हमारे मूल अधिकारों का हिस्सा है। हमने तो आज़ादी आंदोलन के द्वारा प्राप्त की थी।

लद्दाख जैसा देश में कोई प्रदेश नहीं है। इसकी अद्भुत पर कठोर प्राकृतिक सुन्दरता मंत्रमुग्ध करने वाली है। ऊँचे पहाड़ है जिन पर कुछ नहीं उगता। इसे ठंडा रेगिस्तान भी कहा जाता है। बीच में से शांत सिंधु और जांस्कर नदियाँ बहती है। 13000-14000 फुट की ऊँचाई पर घाटी स्थित है। आक्सीजन की कमी के कारण कई बाहरी लोगों को समस्या आती है। दुनिया की सबसे ऊँची झील पैंगोंग यहाँ है जिसको लेकर भारत और चीन के बीच तनातनी रहती है। क्षेत्र अपनी बौद्ध संस्कृति के लिए प्रसिद्ध है इसलिए शांत है। इसके गोम्पा (मठ)के अंदर अत्यंत शांत वातावरण होता है और बाहर से गए व्यक्ति को लगता है कि वह इस शान्ति का उल्लंघन कर रहा है। पर यह क्षेत्र अत्यंत संवेदनशील भी है क्योंकि चीन के साथ हमारी लम्बी सीमा है जहां लगातार झड़पें होती रहती है। हमें वहाँ के लोगों का अधिक सहयोग चाहिए जो गोली चलाने से नहीं मिलेगा।

घटनाक्रम कुछ इस प्रकार का है। 2019 में सरकार ने जम्मू कश्मीर पर लागू धारा 370 तथा 35A निरस्त कर दिए थे। जब लद्दाख को जम्मू कश्मीर से अलग कर केन्द्रीय शासित प्रदेश बना दिया तो बौद्ध बहुसंख्या वाले लेह ज़िले ने जश्न मनाया। दशकों से उनकी यह माँग थी। लेकिन एक साल के अंदर अंदर यह उत्साह ठंडा पड़ गया। 35A को निरस्त करने से क्षेत्र में रोज़गार, ज़मीन की मिल्कियत, और बाहरी लोगों के प्रवेश की आशंका को लेकर बेचैनी शुरू हो गई। पूर्व राजदूत पी स्टोबडन जो लद्दाखी हैं ने लिखा है, “जश्न जल्द संवैधानिक संरक्षण की माँग में बदल गया। जो आज़ादी का जोश था उसकी जगह सुरक्षा की तलाश ने ले ली”। बाहर से गए अधिकारी इस असुरक्षा की भावना को समझ नहीं सके और पहली बार नौबत यहाँ तक पहुँच गई कि गोली चलानी पड़ी, चार लोग मारे गए और दर्जनों घायल हो गए। अधिकारियों का कहना था कि सेल्फ़ डिफैंस में गोली चलानी पड़ी। हो सकता है कि उनकी बात सही हो, पर ऐसी हालत ही क्यों बनने दी गई कि ‘सेल्फ़ डिफ़ेंस’ में गोली चलानी पडे?

अगर लोगों की माँग व्यवहारिक नहीं हैं तो समझाने की ज़रूरत है। लद्दाख के लोगों की मूल माँगो में स्टेटहुड और संविधान के छठे शेड्यूल में शामिल करना है। वह अपनी ज़मीन पर अपना अधिकार सुरक्षित चाहतें हैं। तीन लाख लोगों की आबादी वाले प्रदेश को स्टेटहुड नहीं दिया जा सकता। छठा शेड्यूल आदिवासी क्षेत्रों की व्यवस्था के लिए है जैसे मेघालय,त्रिपुरा, मिज़ोरम और असम में है। इसे उतर पूर्व के कुछ हिस्सों के लिए बनाया गया था। मणिपुर में यह अभी भी लागू नहीं किया गया। भाजपा ने अपने घोषणा पत्र में इसे देने का वादा किया था पर अब केन्द्र सरकार ने मन बदल लिया लगता है। इस पर फिर से विचार होना चाहिए। केन्द्र सरकार ने लद्दाख की खुले दिल से मदद की है। 2019 से पहले प्रदेश को केन्द्र से केवल 57 करोड़ रूपए वार्षिक मिलते थे जो अब बढ़ कर 6000 करोड़ रुपए हो गए है। इतनी भारी मदद के बावजूद असंतोष है। छ: साल से वह लोकतांत्रिक अधिकारों से वंचित हैं। कोई निर्वाचित विधानसभा नहीं है। निर्णय दिल्ली से भेजे प्रशासक ले रहें हैं जिन्हें स्थानीय संवेदनाओ, ज़रूरतों और संस्कारों के बारे कोई ज्ञान नहीं है। उपर से बढ़ती बेरोज़गारी के कारण युवाओं में असंतोष है। परिणाम लेह जैसे शांतिमय शहर में लोगों के असंतोष का विस्फोट हो गया।

इस सब के केन्द्र में सोनम वांगचुक हैं। वह अपनी माँगों के लिए दिल्ली तक पदयात्रा कर चुकें हैं। लद्दाख पहुँच कर उन्होंने भूखहडताल शुरू कर दी जिसके 15वें दिन स्थिति हाथ से निकल गई और लेह में हिंसा भड़क उठी।  सारे लद्दाख मे बेचैनी फैल गई और लद्दाखी संगठनों ने केन्द्र के साथ बातचीत बंद कर दी। दूसरा परिणाम यह हुआ कि सोनम वांगचुक जो प्रदर्शन का चेहरा थे को रासुका के अधीन गिरफ़्तार कर लिया गया। उन पर हिंसा उकसाने का आरोप लगाया गया जिसका वह ज़बरदस्त प्रतिवाद करतें हैं। वांगचुक ने ज़रूर अपने भाषणों में नेपाल के ‘जैन ज़ैड’ और ‘अरब स्प्रिंग’ का ज़िक्र किया था। बेहतर होता कि कोई उन्हें सावधान करता कि यह अनुचित है।

वहाँ प्रदर्शनकारियों पर गोली चलाई गई। यह कितनी बड़ी त्रासदी थी यह सेवांग थरचिन की मौत से पता चलता है। वह फ़ौजी था और उसका परिवार भी फ़ौजी है। उसके पिता ने कारगिल की लड़ाई में हिस्सा लिया था। वह बतातें हैं, “ यह कैसे हुआ…गलवान के समय भी चीनियों ने ऐसे गोली नहीं चलाई थी। यहाँ तो पुलिस ने अपने लोगों पर गोली चला दी…आम तौर पर फ़ायरिंग पहले हवा में की जाती है फिर घुटनों के नीचे। मेरे बेटे को तो ज़मीन में लटा कर गोली मारी गई”। सेवांग का भाई कहता है कि “मैं बता नहीं सकता कि वह कितना बड़ा देश भक्त था। उसने जल्दी रिटायरमेंट ले ली ताकि वह अपने तीनों बच्चों को सैनिक स्कूल भेज सके”।लेह के पुलिस चीफ़ का कहना था कि अगर गोली न चलाते तो ‘लेह को आग लग जाती”। उनकी बात सेवांग के परिवार के कथन से मेल नहीं खाती। स्पष्ट है कि प्रशासन ने स्थिति को सही नहीं सम्भाला और जो क्षेत्र देश भक्तों का क्षेत्र है, जो सेना में लोग भेजता है, उसे ज़ख़्मी कर दिया गया है। यह मणिपुर नहीं है जहां दो जातियाँ लड़ रहीं हैं। यहाँ संवाद कर और किसी प्रकार का प्रतिनिधित्व दे कर मामला सुलझाया जा सकता था। हर जगह प्रशासनिक हथौड़ा नहीं चलना चाहिए।

मेजर जनरल बख्शी जो कभी मोदी सरकार के प्रशंसक रहे हैं पर अब आलोचक हैं, ने बताया है, “लद्दाख के लोग बहुत सीधे और प्यार वाले है। बौद्ध होने के कारण वह बहुत दयालु हैं फिर भी वह दुनिया में सबसे बढ़िया पहाड़ी सैनिक हैं। उन्होंने भारत की सुरक्षा के लिए जानें दी हैं। अशोक चक्र तक सम्मान उन्हें मिलें हैं”। लद्दाखी कहतें हैं कि हम सेना के साथ सांझेदारी करतें हैं, उनके हर कदम पर साथ देते हैं। बहुत दुख है कि ऐसे लोगों पर गोली चलाई गई। हमें तो इस नाज़ुक क्षेत्र,जिसकी सीमा चीन और पाकिस्तान से लगती है, के देशभक्त लोगों को प्रोत्साहित करना चाहिए।हिंसा ग़लत है पर वहां तक नौबत नहीं आनी चाहिए थी।  मेजर जनरल बख्शी का कहना है, “भगवान के लिए हम इस महत्वपूर्ण सीमावर्ती प्रदेश के प्रति उदासीन नहीं हो सकते”।

 लद्दाख में भी विरोधाभास है। एक तरफ़ वह तरक़्क़ी चाहतें है। और पर्यटक चाहतें हैं पर उन्हें यह भी घबराहट है कि बाहरी लोग उनकी संस्कृति को मिटा रहें हैं। बाहरी लोग ज़मीनें ख़रीद रहें हैं। वांगचुक ने भी कहा है कि “ संघर्ष पर्यावरण, संस्कृति, नदियों, ग्लेशियर और लोगों के लिए है”। अब उनकी रिहाई से पता चलता है कि केन्द्रीय सरकार फिर संवाद क़ायम करना चाहती है। वांगचुक भी ले दे कर मसला ख़त्म करना चाहतें हैं। जम्मू कश्मीर के पूर्व मुख्य सचिव सी फुंतसौंग ने  कहा है कि “लद्दाख की भौगोलिक स्थिति और चीन और पाकिस्तान के साथ सीमा के कारण अशान्ति को बढ़ने नहीं देना चाहिए”।चीन के साथ फिर टकराव हो सकता है इसलिए क्षेत्र में शान्ति चाहिए। वहाँ के लोग बाग़ी नहीं है। भारत की विभिन्नता हमारी कमजोरी नहीं, ताक़त है। आगे का रास्ता विरोध दबाने का नहीं हो सकता। क्षेत्र की शान्ति और स्थिरता के लिए उच्च स्तर पर संवाद  चाहिए। प्रधानमंत्री मोदी को खुद दखल देना चाहिए। अब तो डानल्ड ट्रम्प ने भी ईरान से वार्ता शुरू कर दी है ! लद्दाखी तो हमारे अपने हैं, और ‘अपने तो अपने होतें हैं’। अत्यंत विकट परिस्थिति में भी लद्दाख देश की सबसे वफ़ादार सीमा है।

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About Chander Mohan 811 Articles
Chander Mohan is the grandson of the legendary editor of Pratap, Mahashya Krishan. He is the son of the famous freedom fighter and editor, Virendra. He is the Chief Editor of ‘Vir Pratap’ which is the oldest hindi newspaper of north west india. His editorial inputs on national, international, regional and local issues are widely read.