इनके सपने मरने नहीं चाहिए , Their Dreams Should Not Die

यह संतोष की बात है कि कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) का दिल्ली में जंतर मंतर पर आयोजन शांतिमय ढंग से हो गया। सरकार ने समझदारी दिखाई और टकराव का रास्ता नहीं अपनाया। युवाओं को अपनी भड़ास निकालने का मौक़ा दिया, जैसा लोकतंत्र में होना भी चाहिए। सीजेपी के नेताओं नें भी समझदारी दिखाई। अभिजीत दिपके ने बार बार शॉति की अपील की। सोनम वांगचुक का भी कहना था कि यह “अपील है,प्रोटेस्ट नही”। वह सरकार से टक्कर नहीं लेना चाहते इसीलिए शिक्षा मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान के इस्तीफ़े की माँग मनवाने के लिए एक सप्ताह का समय और दे दिया है। सरकार के लिए धर्म संकट है। अगर वह इस्तीफ़ा लेतें है तो लगेगा कि सरकार झुक गई है जो प्रभाव यह सरकार नहीं देना चाहेगी। पर अगर वह इस्तीफ़ा नही देते तो प्रभाव यह जाएगा कि सरकार युवाओं की चिन्ता के प्रति संवेदनशील नहीं है। यह सम्भावना भी है कि आंदोलन देश भर में फैल जाए क्योंकि परीक्षा में हुए घपले से देश भर के युवा और उनके परिवार प्रभावित है।

मोदी सरकार के लिए किसान आन्दोलन के बाद यह दूसरी बड़ी समाजिक चुनौती है। बेहतर होगा कि धर्मेन्द्र प्रधान को किसी और विभाग में भेज दिया जाए क्योंकि शिक्षा क्षेत्र में इतना बड़ा संकट पहले नहीं देखा गया। लोकतंत्र में अपने लोगों की माँग के आगे झुकना कमजोरी नहीं मानी जाती। इसे लोक भावना के प्रति संवेदनशीलता कहा जाता है। चीन से पराजय के बाद लोगों के दबाव में प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू को रक्षामंत्री कृष्णा मेनन को हटाना पड़ा था। बड़ा उदाहरण लाल बहादुर शास्त्री का है जिन्होंने दो रेल दुर्घटना के बाद खुद इस्तीफा दे दिया था। पहली बार नेहरू ने रोक दिया था पर जब दूसरी बार रेल दुर्घटना हुई तो शास्त्री जी अड़ गए कि इस्तीफ़ा स्वीकार किया जाए। पर यहाँ तो बार बार पेपर लीक हो रहें हैं पर न धर्मेन्द्र प्रधान खुद इस्तीफ़ा दे रहें है, न उनसे लिया जा रहा है। सीबीएसई को दो अफ़सरों का तबादला कर दिया गया। पर क्या हज़ारों युवांओं के भविष्य से खिलवाड़ करने के लिए यह पर्याप्त सजा है? नीट-यूजी पेपर लीक और रद्द होने के अवसाद में मध्य प्रदेश की आकांक्षा ने आत्महत्या कर लिया। माँ बाप के लिए छोड़े पत्र में वह लिख गई कि दोबारा तैयारी करने की हिम्मत नहीं है। नीट रद्द होने के बाद छ: अभ्यर्थी आत्म हत्या कर चुकें हैं। अगर पेपर लीक न होता तो आकांक्षा और यह पाँच बच्चे आज जीवित होते। इनकी मौत के लिए कौन ज़िम्मेवार है? कब ठोस जवाबदेही तय होगी कि आगे किसी आकांक्षा को अपनी जान न लेनी पड़े और माँ बाप बिलखते न रह जाए?

जन्तर मंतर पर जो कहा गया वह ही संदेश नहीं था, जैसी उपस्थिति थी वह खुद में बड़ा संदेश था। युवा तो थे ही। एक 11 वर्ष का बच्चा भी था जिसे अपने भविष्य की चिन्ता है। चिन्ता है कि वह रात दिन जाग कर पढ़ाई करेगा, माँ बाप के पैसे खर्च करेगा पर कोई और एग्ज़ाम को ही हाइजैक कर ले जाएगा। वहाँ एक बाप भी उपस्थित थे जो खुद को भाजपा समर्थित कह रहे थे पर अब ख़फ़ा है क्योंकि उनके बेटे की नीट-यूजी परीक्षा पेपर लीक होने को कारण दोबारा हो रही है। दिल्ली यूनिवर्सिटी की प्रोफ़ेसर नन्दिता नारायण का कहना था कि “युवा जाग चुकें हैं”। अपनी बेटी के साथ वहाँ मौजूद शिल्पा का कहना था, “जब बच्चे सालों परीक्षा की तैयारी करते हैं तो माँ बाप भी उसी तनाव और अनिश्चितता का शिकार हो जातें हैं। शिक्षा अब सार्वजनिक सेवा नहीं रही बल्कि पैसे बनाने का सिस्टम बन गई है”।

यह भी उल्लेखनीय है कि जंतर मंतर पर न ‘हिन्दू-मुस्लिम’ का कोई मामला था न कोई जाति मतभेद का। सब साँझे मक़सद के लिए वहाँ इकट्ठे थे। शिकायत की गई कि वास्तविक समस्याओं से ध्यान देने की जगह बहुत हिन्दू- मुस्लिम किया जा रहा है। यह भी दिलचस्प है कि धर्मेन्द्र प्रधान के इस्तीफ़े के अतिरिक्त जो नारा सबसे अधिक लगा वह था, ‘गोदी मीडिया दो बैंक”। मीडिया के एक वर्ग की भूमिका वास्तव में राष्ट् विरोधी है। निष्पक्ष पत्रकारिता करने की जगह वह समाज को साम्प्रदायिक तौर पर बाँटने का घिनौने काम कर रहें है। अच्छी बात है कि युवाओं ने उन्हें भी शीशा दिखा दिया।   

भारत में 15-29 साल के 40 करोड़ युवा हैं। वह देख रहें हैं कि सारा ढाँचा भ्रष्ट हो चुका है। चुनाव होते है। लोग बढ़चढ़ तक हिस्सा लेतें हैं पर बदलता कुछ नहीं। यह हताशा अब खुली प्रकट होने लगी है। विशेष तौर पर शिक्षा व्यवस्था ढह चुकी है। प्राईवेट और संदिग्ध संस्थाएँ परीक्षा सुपरवाइज कर रही है। अब बताया जा रहा है कि पेपर लीक होने से बचाने के लिए एयर फ़ोर्स के द्वारा इन्हें ट्रांसपोर्ट किया जाएगा। क्या नाकामी की इससे बड़ी स्वीकृति हो सकती है कि परीक्षा पेपर एयर फ़ोर्स उठा रही है? नागरिक प्रशासन कहाँ गया? और पेपर लीक तो ट्रांसपोर्ट से पहले हो रहें है। क्या एयरफ़ोर्स को बीच में लाकर जो वास्तव में अपराधी है उनसे ध्यान हटाने का प्रयास हो रहा है ? हक़ीक़त है कि शिक्षा हमारी प्राथमिकता में नहीं है। चीन के उत्थान में उच्च शिक्षा का बड़ा हाथ है। अमेरिका ने भी जो इतनी तरक़्क़ी की है वह हार्वर्ड, स्टैनफ़ोर्ड और एमआईटी जैसी उच्च शिक्षा संस्थानों के बल पर की है। हमारा सारा ध्यान ‘अपना आदमी’ उच्च संस्थानों में बैठाने पर लगा रहता है। योग्यता ज़्यादा महत्व नहीं रखती। हमारी शिक्षा व्यवस्था की शोचनीय हालत पर शिक्षाविद प्रताप भानु मेहता का कटाक्ष है, “केन्द्र और प्रदेशों में हमारे शिक्षा मंत्री चीन और दूसरे प्रतिस्पर्धीयों को हमारा सबसे बड़ा उपहार है”।

 यह अच्छी बात है कि शिक्षा और उसकी व्यवस्था पर चर्चा तो हो रही है। यह इस कॉकरोच आंदोलन का सबसे बड़ा योगदान होगा। भाजपा अध्यक्ष नितिन नबीन का कहवा है कि “भारत का युवक विदेशी भूमि पर बैठे कुछ लोगों के हाथ की कठपुतली नहीं है”। यह ‘विदेशी भूमि’ कहाँ से आगई?यह तो शुद्ध देसी आन्दोलन है। युवाओं नें भी किसी राजनीतिक दल के पक्ष में या विरोध में नारे नहीं लगाए। वास्तव में कोई भी राजनीतिक दल इस आंदोलन से खुश नहीं है। भाजपा तो वैसे ही इन्हें पसंद नहीं करती। कांग्रेस को चिन्ता है कि कहीं यह आप-2 तो नहीं, आख़िर अभिजीत दिपके आप के साथ रह चुकें है। इसीलिए इस नई पैदायश के प्रति कांग्रेस का रवैया ठंडा है। आप को चिन्ता है कि कहीं यह उनका युवा समर्थन छीन ने ले। जैसे आप शुरू हुई और कॉकरोच जनता पार्टी का उत्थान समांनातर लगता है। द टेलिग्राफ ने इस आंदोलन को बढ़ती बेरोज़गारी,परीक्षा घोटाला और राजनीतिक व्यवस्था से असंतोष का प्रतीक बताया है, पर साथ यह भी कहा है कि यह ‘विपक्ष की कमी के ख़ालीपन को भी भर रहा है”।

सीबीएसई में घपले और मिलीभगत का भांडाफोड एक18 वर्ष के साहसी लड़के ने किया है। झारखंड के सार्थक सिद्धांत  ने वह कर दिखाया जो बड़े बड़े नहीं कर सके। पूरी स्पष्टता के साथ उसने अपने ब्लॉग में लिखा है कि,”मेरा कहना है कि नियम,शर्तें, और धाराऐं बदली गई। ऐसा एक विशेष कम्पनी ‘कोएम्प्ट’ को फ़ायदा पहुँचाने के लिए किया गया”। यह बच्चा न केवल सीबीएसई बल्कि सारे प्रशासन तंत्र पर सवाल खड़े कर रहा है। सार्थक सिद्धांत जैसे प्रतिभाशाली युवा देश का भविष्य है। उसे या 15 वर्ष के क्रिकेटर वैभव सूर्यवंशी जैसों को देख कर उत्साह होता है कि अभी आशा है, सब कुछ तमाम नहीं हो चुका। सार्थक झारखंड से है तो वैभव बिहार से। दोनों ही पिछड़े प्रदेश माने जातें हैं पर कितना ख़ज़ाना है इनमे? जिसे जेन-जी कहा जाता है, में कितनी प्रतिभा है? वैभव सूर्यवंशी को तो बीसीसीआई ने अच्छी तरह से सम्भाल लिया है पर सार्थक जैसे जो लाखों- करोड़ों युवा है उनका क्या होगा? यह चिन्ता है ।क्या यह भ्रष्ट और असंवेदनशील व्यवस्था इन्हें सम्भाल सकेगी? क्या व्यवस्था इनकी बात सुनेगी या हिन्दू- मुसलमान ही करती जाएगी?

दिलचस्प है कि जब सार्थक से उसका फ़ेवरिट कवि पूछा गया तो उसने साहिर लुधियानवी का नाम लिया। और जब यह पूछा गया कि साहिर की सबसे पसंद पंक्तियाँ कौनसी है तो उसने बताया, तू हिन्दू बनेगा न मुसलमान बनेगा, इंसान की औलाद है इंसान बनेगा ! आजकल के ‘धुरंधर’ युग में यह नौजवान ताज़ा हवा का झोंका नज़र आता है।

कॉकरोच आंदोलन आगे चलता है या फीका पड़ जाता है यह तो समय बताएगा पर यह लोग जो संदेश दे रहें हैं उसे अनदेखा नहीं करना चाहिए। न केवल पेपर लीक बल्कि बेरोज़गारी उन्हें परेशान कर रही है। क्या कारण है कि कुछ दिनों में ही कॉकरोच जनता पार्टी के फ़ॉलोवर्स 2.2 करोड़ से अधिक हो गए? सरकार को इस हताशा को समझना चाहिए और इस युवा अत्यंत प्रतिभाशाली पीढ़ी के साथ संवाद शुरू करना चाहिए। इनमें राजनीतिक और सरकारी तंत्र के प्रति हताशा क्यों बढ़ रही है? इसका इलाज तत्काल तो नहीं निकाला जा सकता, पर बात तो होनी चाहिए। जंतर मंतर पर उस दिन उपस्थित एक युवा ने पंजाब के क्रान्तिकारी कवि पाश जिसे 1988 में जालंधर में उग्रवादियों ने गोली मार दी थी, की एक कविता की यह पंक्तियाँ दोहराईं,

          सबसे ख़तरनाक होता है हमारे सपनों का मर जाना

अब नेतृत्व की ज़िम्मेवारी है कि और सपनों को वह मरने न दें।

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Chander Mohan is the grandson of the legendary editor of Pratap, Mahashya Krishan. He is the son of the famous freedom fighter and editor, Virendra. He is the Chief Editor of ‘Vir Pratap’ which is the oldest hindi newspaper of north west india. His editorial inputs on national, international, regional and local issues are widely read.