पश्चिम बंगाल के बाद बम बम भारतीय जनता पार्टी यह प्रभाव दे रही है कि अगला क़िला जो वह फ़तह करने जा रहे हैं, वह पंजाब होगा। बंगाल की जीत के बाद चंडीगढ़ में पार्टी दफ़्तर के बाहर यह नारा लगाया गया, ‘बंगाल की जीत हमारी है, अब पंजाब की बारी है”। पूर्व प्रदेश अध्यक्ष सुनील जाखड़ का कहना था कि अगर पार्टी बंगाल में तीन सीट से दो-तिहाई तक छलांग लगा सकती है तो पंजाब में वह यह क्यों दोहरा नहीं सकती? तब से सुनील जाखड़ खुद बदले जा चुकें हैं और उनकी जगह मल्टी-मिलिनियर केवल सिंह ढिलों जो सुनील जाखड़ की ही तरह कांग्रेस में रहें हैं, को नया अध्यक्ष बना दिया गया है। जहां तक सुनील जाखड़ के सवाल का सम्बंध है, इसका सीधा जवाब है कि पंजाब बंगाल नही है, और भगवंत मान की आम आदमीं पार्टी ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस नहीं है। और न चंडीगढ़ कोलकाता है।
स्थानीय निकाय चुनावों मे आप को भारी जीत मिली है। दूसरे नम्बर पर कांग्रेस, फिर आज़ाद, फिर शिरोमणि अकाली दल और अंत में भाजपा रही है। पंजाब और बंगाल दोनों सीमावर्ती प्रांत है पर दोनों का इतिहास, संस्कृति, राजनीति, आर्थिक और समाजिक हालत अलग हैं। यहाँ न तो हिन्दू -मुसलमान का कोई मसला है और न ही घुसपैंठियों की कोई समस्या है। न ही नफ़रत फैलाने वाले नेता है। पश्चिम बंगाल की राजनीति बहुत हिसंक हो चुकी है जो ममता बनर्जी के भतीजे अभिषेक बनर्जी तथा सांसद कल्याण बैनर्जी पर हुए हमले से भी पता चलता है। पंजाब में वह हथकंडे नहीं अपनाए जा सकते जो कुछ प्रदेशों में अपनाए गए हैं। मिलिटैंसी के समय भी यहां साम्प्रदायिक दंगे नहीं हुए थे। पंजाब के मुद्दे और हैं पर हम सौभाग्यशाली हैं उन मुद्दों मे नफ़रत शामिल नहीं है। सरबत दा भला की भावना साम्प्रदायिक राजनीति से मेल नहीं खाती।
स्थानीय निकाय के चुनाव बता गए हैं कि यहाँ अभी शासन विरोधी भावना नहीं है। भाजपा का प्रदर्शन पहले से बेहतर रहा है। 2021 में वह 49 वार्ड जीतने नें सफल रहे थे जो अब बढ़ कर 172 हो गए हैं। अबोहर नगर निगम में इन्हें बहुमत मिला है और पठानकोट में वह सबसे बड़ी पार्टी है। पर बाक़ी निगमों में वह बहुत पीछे है और नगर पंचायतों में भाजपा का खाता भी नहीं खुला। भाजपा के नेता बहुत ज़ोर लगा रहें हैं। प्रधानमंत्री मोदी भी एससी वोट को प्रभावित करने के लिए प्रभावशाली डेरा बल्लां आ चुकें हैं। ब्यास डेरे से भी सम्पर्क किया जा रहा है। पंजाब में एससी वोट 32% है जो 117 में सें 23 सीटें सीधा प्रभावित करता है। दोआबा में यह आबादी 45% है। इसी वोटर नें पिछली बार आम आदमी पार्टी की सरकार बनाई थी। भाजपा का नेतृत्व इसी वोटर को तोड़ने का प्रयास कर रहा है। लेकिन चल उलटे रास्ते पर हैं।
केवल सिंह ढिलों जिनके बारे बताया जाता है कि उनके न केवल देश में कई घर है बल्कि दुबई और स्पेन में भी है, को पार्टी अध्यक्ष बना कर भाजपा दलित वोट को कैसे आकर्षित करेगी? न जाने भाजपा नेतृत्व में उच्च वर्ग के जाट नेताओं (अमरेन्द्र सिंह, रवनीत सिंह बिटटू, केवल सिंह ढिलों, तरनजीत सिंह संधू) का इतना आकर्षण क्यों है? क्या किसान आंदोलन से पैदा हुई नाराज़गी को कम करने का प्रयास हो रहा है? भाजपा का अपना समर्थन और अपना काडर गैर-सिख है। प्रदेश भाजपा के पास समर्पित नेताओं की कमी नहीं है। यह लोग पार्टी की दिशा को देख कर भौचक्के हैं। पार्टी का नेतृत्व अपने लोगों को आगे करने की जगह राजनीतिक इम्पोर्ट पर भरोसा कर रहा है। कोशिश हो रही है कि देहात में पार्टी के पैर जम जाए पर यह परिणाम तो उल्टा संदेश देते है। सिख उस पार्टी को समर्थन नहीं देंगे हिन्दुत्व जिसका मूल सिद्धांत है।
इस इम्पोर्ट से पार्टी के अपने लोगों में बेचैनी है। उल्लेखनीय है कि न्यू अध्यक्ष केवल सिंह ढिलों के बरनाला में भाजपा केवल 7 वार्ड ही जीत सकी। शहरी निगमों में भाजपा का यह हाल है कि बठिंडा में 1, बटाला में2,कपूरथला में 3, मोगा में 3, मोहाली में 3,सीटें ही मिली हैं। भाजपा का परम्परागत वोट हिन्दू है। समझा जा रहा है कि नरेन्द्र मोदी की लोकप्रियता के कारण यह कहीं नहीं जाएगा पर यह परिणाम तो और ही कुछ बता रहें है। ग्रामीण क्षेत्रों में समर्थन नहीं मिला और शहरी क्षेत्र में लोग नाखुश है। बढ़ती महंगाई और आर्थिक संकट से स्थिति और ख़राब हो रही है। अखिल भारतीय परीक्षा का घोटाला छवि प्रभावित कर रहा है। पंजाब की स्थिति अलग हैं, यह असम या बंगाल नहीं है। यह नहीं भूलना चाहिए कि अच्छे समय में जब यहाँ अकाली-भाजपा सरकार थी अरुण जेटली जैसा बड़ा नेता अमृतसर से हार गया था। यही हालत हरदीप सिंह पुरी और तरनजीत सिंह संधु की बनी थी। जब तक लोगों, विशेष तौर पर ग्रामीण, का विश्वास हासिल नहीं होता भाजपा की दाल गलने वाली नही। उन्हें तो अपने शहरी वोटर की चिन्ता करनी चाहिए जो अपनी अनदेखी से नाराज़ है। कहीं यह हालत न बने कि माया मिली न राम ! भाजपा ने 100 वार्डों में ज़मानत गवां दी है । अकाली दल के साथ गठबंधन का विकल्प है पर तब अतीत का बोझ भी साँझा करना पड़ेगा।
चाहे यह प्रभाव दिया जा रहा है कि मुक़ाबला आप और भाजपा में है, यह हक़ीक़त नहीं है। असली मुक़ाबला आप और कांग्रेस के बीच है शर्त यह है कि कांग्रेस अपना अव्यवस्थित घर सही करने में सफल हो जाए, जिसके कोई संकेत अभी नज़र नहीं आ रहे। पिछले चुनाव में कांग्रेस के पास 4 नगर निगम थे जो अब गिर कर 1 रह गया है पर बटाला, पठानकोट, मोहाली में प्रदर्शन बुरा नहीं रहा। कांग्रेस की बड़ी समस्या है कि उनके पास नेताओं की भरमार है। प्रताप सिंह बाजवा, अमरेन्द्र सिंह वड़िंग, चरणजीत सिंह चन्नी, सुखजिन्दर सिंह रंधावा सब मुख्यमंत्री बनने चाहते हैं। पार्टी इन सिख नेताओं में उलझी हुई है जबकि कांग्रेस का असली आधार हिन्दू और एससी वोटर हैं। जब से पंजाब में आप सतारूढ हुई है कांग्रेस छ: उपचुनाव हार चुकी है। यह कैसे सोच लिया कि अगले साल के विधानचुनाव में ऐसा विभाजित नेतृत्व आप को चुनौती दे सकेगा? यह लोग आप का मुक़ाबला करने की जगह एक दूसरे की टांग खींचने में लगें है।
कांग्रेस का दुर्भाग्य है कि हाईकमान निंद्रा में है या सारा ध्यान दक्षिण पर है। हिमाचल में हुए चार निगम चुनाव में भाजपा तीन जीत गई है। यह कैसे हो गया जबकि समझा यह जाता है कि ऐसे चुनावों में सता पक्ष का हाथ उपर रहता है। लगता है कि हिमाचल भी उसी तरह हाईकमान की उपेक्षा का शिकार है जैसे पंजाब है। अगर हालत नहीं सुधरे तो हिमाचल प्रदेश जो उत्तर भारत में कांग्रेस का एकमात्र प्रदेश है, भी अगले साल हाथ से फिसल सकता है। पंजाब के बारे भी कांग्रेस के नेतृत्व को किसी ग़लतफ़हमी में नहीं रहना चाहिए। अगर चंडीगढ़ भाजपा के लिए दूर है तो अभी कांग्रेस की पहुँच से भी बाहर नज़र आता है। कारण है कि मुक़ाबला भगवंत मान की आप से है। मैंने इसे ‘भगवंत मान की आप’ इसलिए कहा है क्योंकि मान अब अरविंद केजरीवाल की परछाई से बाहर आ चुकें है और आगे आ कर नेतृत्व दे रहें है। पोस्टर और विज्ञापन पर भी अब अकेले भगवंत मान की तस्वीर होती है। अंतर भी साफ़ है। केजरीवाल एक पराजित मुख्यमंत्री है जबकि भगवंत मान को अभी तक कोई धक्का नहीं पहुँचा। पंजाब से छ: राज्यसभा सांसदों का दलबदल ज़रूर बुरा था पर यह दोनों के बराबर हिस्से आया है क्योंकि चुनाव दिल्ली से हुए थे। संतुलन कैसे मान की तरफ़ झुक गया यह इस से पता चलता है कि अरविंद केजरीवाल भी कह रहें हैं कि यह परिणाम “मान सरकार के कामों को शाबाशी है”।
भगवंत मान की सबसे बड़ी विशेषता है कि वह वह नहीं जो पहले मुख्यमंत्री थे ! न वह राजसी ठाठ न दूसरी कमज़ोरियाँ। शुरू में उनका कम आँकलन किया गया। समझा गया कि वह एक कामीडियन है क्या सरकार चलाएगें? इसीलिए राघव चड्ढा को उनके सर पर बैठा दिया गया। लेकिन समय के साथ भगवंत मान समर्थन और आत्म विश्वास हासिल करते गए। जिस प्रकार वह आम जनता के साथ रिश्ता जोड़ लेतें हैं वह क्षमता बहुत कम नेताओं के पास है। वह मज़ाक़ मज़ाक़ में वज़नदार बात कह जातें हैं। भाजपा को ‘ईडी पार्टी’ कह चुकें हैं। छ: राज्यसभा सासंदो के दलबदल पर कहना है कि”पंजाब में भाजपा के 2 विधायक हैं पर राज्यसभा में 6 सांसद है। यह जायज है”? लोग उनकी बात समझतें हैं। इसलिए जो पार्टियां आप को हटाना चाहती हैं उन्हें समझ लेना चाहिए कि मुक़ाबला भगवंत मान से है जिनके ख़िलाफ़ इस वक़्त तक कुछ नहीं है। कोई सरकार विरोधी लहर नज़र नहीं आती। हाँ,पंजाब के सामने कई चुनौतियां है। क़र्ज़ा 4 लाख करोड़ रूपए तक बढ़ गया है। नशा – तस्करी हो रही है, गैंगस्टरवाद फैल रहा है, कई जगह बम विस्फोट हो चुकें हैं। क्राइम बढ़ा है। पर नशा और गैंगस्टरवाद की समस्या उन्हें विरासत में मिली हैं। पिछली अकाली-भाजपा और कांग्रेस की सरकारें क़र्ज़ा और व्याप्त ड्रग-गैंगस्टर संस्कृति छोड़ गईं है। पर हां, इन्हें सम्भालना वर्तमान सरकार की ज़िम्मेवारी है। वह यह काम किस तरह करतें हैं, यह भावी राजनीति तय करेगा।