दिल बहलाने को ख्याल अच्छा है

दिल बहलाने को ख्याल अच्छा है

पंजाबी का मुहावरा है “पिंड वसया नहीं उचक्के पहलां आ गए”, अर्थात्ï गांव तो अभी बसा नहीं बदमाश पहले पहुंच गए। 2014 के चुनाव को लेकर जनता दल (यू) तथा भाजपा के बीच जो रार छिड़ गई है उसके बारे भी यही कहा जा सकता है। दो वर्ष पड़े है और यह भी मालूम नहीं कि राजग की सरकार बनेगी या नहीं पर अभी से इसे लेकर राजग में सर फोडऩे की नौबत आ गई हैं। समझ नहीं आ रही कि इस वक्त बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को भावी प्रधानमंत्री की योग्यता का मामला खोलने की क्या मजबूरी थी सिर्फ इसके कि वह खुद को बहुत बड़ा ‘सैक्यूलर’ सिद्ध करना चाहते हैं। उनकी मांग है कि कोई धर्मनिरपेक्ष व्यक्ति ही प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बने।

आपत्ति 2002 के गुजरात दंगो को लेकर है पर खुद नीतीश 2004 तक राजग सरकार में मंत्री रहे। नरेंद्र मोदी ने तो उनकी बात का जवाब नहीं दिया पर संघ प्रमुख मोहन भागवत का पूछना है कि ‘हिन्दुत्ववादी प्रधानमंत्री क्यों नहीं होना चाहिए?’ उनका कहना है कि हिन्दुत्व जीवनशैली का नाम है जिसमें सभी को शामिल करने की क्षमता है। उनकी बात बिल्कुल सही है। मैं तो एक कदम आगे बढ़ कर रहूंगा कि भारत धर्मनिरपेक्ष इसलिए है क्योंकि यहां हिन्दुत्व है। हिन्दुत्व ही धर्मनिरपेक्षता को प्रेरित करता है और उसका संरक्षण करता हैं। 80 प्रतिशत से अधिक हिन्दू जनसंख्या वाले देश ने ही एक समय एक मुसलमान को राष्ट्रपति, एक सिख को प्रधानमंत्री और एक ईसाई को संप्रग की अध्यक्षा स्वीकार किया था। ऐसा कहीं और नहीं हो सकता। अमेरिका में भी नहीं। वहां भी गैर ईसाई राष्ट्रपति नहीं बन सकता। बाईबल पर हाथ रख कर शपथ लेनी पड़ती है और श्रद्धा के साथ, परिवार के साथ चर्च जाते तस्वीरें प्रकाशित करवानी पड़ती हैं। अगर भारत का दर्शन उदार है तो हिन्दुत्व के कारण ही है। यह कमजोरी नहीं हमारी ताकत है। अटल बिहारी वाजपेयी न केवल उदारवादी और धर्मनिरपेक्ष हैं बल्कि उनकी पूरी तरह हिन्दुत्व में आस्था है।     लेकिन यहां मसला हिन्दुत्व का नहीं, नरेंद्र मोदी की शख्सीयत का है। यह भी नजर आता है कि राजग का प्रबंधन कमजोर है। पार्टी को नितिन गडकरी एक तरफ, लाल कृष्ण आडवाणी दूसरी तरफ तथा नरेंद्र मोदी तीसरी तरफ खींच रहे हैं।

भाजपा के कुछ नेताओं को आशा है कि संगमा को समर्थन दे कर वह जयललिता तथा नवीन पटनायक को अपने साथ जोड़ लेंगे। मध्यावधि चुनाव की स्थिति पैदा करने की भी कवायद लगती हैं। ऐसा होता है कि नहीं यह तो पता नहीं पर खुद राजग में बिखराव के संकेत मिल रहे हैं। यह भी आशा है कि शायद यूपीए से नाराज ममता बनर्जी भी उनके साथ शामिल हो जाएं जबकि सब जानते हैं कि ममता को खुद मालूम नहीं होता कि अगले क्षण उन्होंने क्या करना हैं।       बृजेश मिश्र का कहना है कि गुजरात दंगों का दाग मोदी को कभी भी गठबंधन सरकार का पीएम नहीं बनने देगा वह इसी सूरत में प्रधानमंत्री बन सकते हैं जब भाजपा अपने दम पर चुनाव जीते। उनकी बात सही पर अभी तो भाजपा के अपने बल पर चुनाव जीतने की संभावना दूर-दूर तक नजर नहीं आती। हां, एक वर्ग में नरेंद्र मोदी का समर्थन है। शहरी मिडल क्लास जो विकास चाहता है और वर्तमान सरकार की निष्क्रियता से परेशान है मोदी को समर्थन दे सकता है। कारपोरेट दुनिया का बड़ा हिस्सा उन्हें आर्थिक सहायता देने के लिए तैयार बैठा हैं। संघ के एक हिस्से में उनका समर्थन है पर बराबर की समस्या है कि संघ तथा भाजपा का एक बड़ा वर्ग नरेंद्र मोदी के बढ़ते कदमों से आशंकित है और उन्हें गुजरात तक ही सीमित रखना चाहता है। नरेंद्र मोदी पर नीतीश कुमार के हमले के बाद भाजपा का एक भी बड़ा नेता मोदी के पक्ष में नहीं आया। यह खामोशी सब कुछ बयान करती है। मोदी की एक प्रकार की निरंकुश राजनीति के भाजपा के शिखर पर सब विरोधी हैं। निश्चित तौर पर मोदी ने वह किताब नहीं पढ़ी ‘हाऊ टू विन फ्रैंड्स एंड इनफ्लूएंस पीपल्स!’।

नटवर सिंह ने लिखा है कि राजीव गांधी की हत्या के बाद कांग्रेस की तरफ से प्रधानमंत्री बनने की पेशकश पहले शंकर दयाल शर्मा को की गई थी। उन्होंने इंकार कर दिया तब पी वी नरसिम्हा राव को प्रधानमंत्री बनाया गया। देश के प्रधानमंत्री पद की पेशकश ठुकराना बहुत हिम्मत की बात है। अगर नरेंद्र मोदी ऐसी घोषणा कर दे तो भाजपा के बहुत मसले हल हो जाएं! पर ऐसा होगा नहीं।       इसलिए अच्छा होगा अगर एक बार इस मसले का सामना कर लिया जाए कि मोदी पीएम पद के उम्मीदवार हैं या नहीं?

मैंने भाजपा में मंथन का स्वागत किया था पर स्वीकार करता हूं कि इससे कुछ विष भी बाहर निकल रहा है। जहां तक नीतीश कुमार का सवाल है उनकी बेवक्त की शहनाई बेसुरी लग रही है। उनका निशाना प्रादेशिक पार्टियों के तीसरे मोर्चे का नेता बनना है जिसके बारे यही कहा जा सकता है दिल बहलाने को ख्याल अच्छा है। केवल नीतीश ही नहीं कई प्रादेशिक नेता भावी प्रधानमंत्री के सपने देख रहे हैं। उनका मानना है कि दोनों बड़ी पार्टियां अगली सरकार बनाने की स्थिति में नहीं होंगी। अर्थात्ï वे मुलायम सिंह यादव+ममता बनर्जी+नीतीश कुमार+नवीन पटनायक+जयललिता+जगनमोहन रेड्डी+चंद्र बाबू नायडू+ शरद पवार आदि स्थिति को देख रहे हैं; जबकि दोनों बड़ी पार्टियों में से एक के बिना कोई सरकार नहीं चल सकती। देश देवे गौडा या इन्द्र कुमार गुजराल वाली हालत फिर बर्दाश्त कर लेगा, ऐसी संभावना नही है।

कहावत है कि कुछ लोग जन्म से महान होते हैं, कुछ महानता प्राप्त करते है तो कुछ पर महानता थोंपी जाती है। यह मैं राहुल गांधी के संदर्भ में कहना चाहता हूं जिनके बारे विदेशमंत्री एसएम कृष्णा का कहना है कि ‘जरूरी है कि वह सरकार में शामिल हो जाए और देश की उसके सामने समस्याओं से निबटने में मदद करें।’ इस सुझाव को पढ़ कर एक बार तो यह अहसास हुआ था कि कृष्णाजी फिर गलत बयान पढ़ गए हैं, पर नहीं यह देश के विदेशमंत्री की राय प्रतीत होती है कि राहुल गांधी ही इस देश के संकट मोचक हैं, तारणहार हो सकते हैं। एक बार वह सरकार में आ जाए तो सब कुछ खुद ही चुस्त-दुरुस्त हो जाएगा, अर्थ व्यवस्था सुधर जाएगी, रुपया बढ़ना शुरू हो जाएगा, लोगों के मनों में कांग्रेस की जो बुरी छवि है वह ओझल हो जाएगी। आखिर सब कुछ विरासत है। दूसरों को तो पहले अपनी क्षमता का प्रदर्शन करना पड़ता है फिर उन्हें जगह मिलती है पर क्योंकि वह ‘गांधी’ है इसलिए पहले जगह मिलेगी फिर वह क्षमता दिखाने की मेहरबानी करेंगे। इस बीच कृष्णा या दिग्विजय सिंह जैसे लोग आग्रह करते रहेंगे कि आइए, आइए, हमें बचाइए! लेकिन यहां एक समस्या है। देश बदल गया है। लोग कांग्रेस के शाही परिवार के प्रति सेवाधर्म का अपना इतिहास भूल गए हैं। न ही वह अब एक मुस्कराहट पर या एक बार हाथ हिलाने से प्रभावित होते हैं। उत्तर प्रदेश के चुनावों में तो रायबरेली तथा अमेठी में भी प्रियंका गांधी का जादू नहीं चला। लोग अब आगे बढ़ गए हैं और राजनीतिक चमचागिरी की आदत कम हो रही है। इसके लिए राहुल गांधी का भी धन्यवाद करना चाहिए। जब देश मुश्किल के दौर में चल रहा था, सरकार एक विस्फोट के बाद दूसरे विस्फोट से चकरा रही थी, उन्होंने खुद को झंझट से दूर रखा। इसलिए कांग्रेस के कुछ लोगों को उनमें अवश्य महानता, क्षमता और योग्यता नजर आती है पर आम आदमी कृष्णा जी के इस सुझाव के बारे भी यही राय रखता है कि, दिल बहलाने को ख्याल अच्छा है।

-चन्द्रमोहन

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Chander Mohan is the grandson of the legendary editor of Pratap, Mahashya Krishan. He is the son of the famous freedom fighter and editor, Virendra. He is the Chief Editor of ‘Vir Pratap’ which is the oldest hindi newspaper of north west india. His editorial inputs on national, international, regional and local issues are widely read.