सबसे बड़ी चुनौती: विश्वास की बहाली, The Challenge Ahead

मोदी सरकार का आठवाँ वर्ष कोविड द्वारा की गई भयावह तबाही की छाया में शुरू हो रहा है। वायरस धीरे धीरे घट रहा है। सरकारी आँकड़ों के अनुसार 350000 मौतें हो चुकीं है पर शमशान के रिकार्ड और गंगा मेंबहती लाशेंकुछ और ही आँकड़ा बता रहीं हैं। आगे तीसरी लहर की सम्भावना से घबराहट है।   जिस देश ने पिछले साल नरेन्द्र मोदी के कहने पर थालियाँ बजाईं थीं, दीपक जलाए थे, उस देश का मिज़ाज बहुत बिगड़ा हुआ है। मोदी इसे ‘शताब्दी में एक बार फैलने वाली महामारी’ क़रार  चुकें हैं पर इससे उनके ज़ख़्म तो नही भरते जो अपने प्रियजन खो बैठें हैं। सी-वोटर के सर्वेक्षण के अनुसार प्रधानमंत्री मोदी की लोकप्रियता में भारी गिरावट आई है, चाहे वह अपने निकटतम प्रतिद्वंद्वी राहुल गांधी से बहुत आगे हैं। लेकिन इतनी ज़बरदस्त गिरावट चिन्ताजनक होनी चाहिए। आगे क्या है, यह तीन बातों पर निर्भर करेगा।

एक, टीकाकरण अभियान किस कुशलता से चलाया जाता है? कोविड की तीसरी लहर जब और अगर, आती है तो इसका कैसे सामना किया जाता है, इस पर बहुत कुछ निर्भर करता है।  जिस तरह सरकार दूसरी लहर से निबटी है और लोगों को अपने हाल पर छोड़ दिया गया था, उससे सरकार पर विश्वास अगर पूरी तरह से उठा नही तो कम से कम बहुत कमजोर हो गया है। जब ज़रूरत थी तो सारा मंत्रिमंडल ही ग़ायब पाया गया। मोदी यह वादा कर आए थे कि व्यवस्था बदलेंगे और इसे संवेदनशील बनाऐंगे पर संकट बता गया कि कुछ नही बदला। इतिहासकार गुरचरण दास ने सही लिखा है,“एक दिन कोविड चला जाएगा पर इन गली सड़ी संस्थाओं से निबटने का कष्ट नही जाएगा”। टीवी पर हम उत्तर प्रदेश और बिहार के ग्रामीण स्वास्थ्य केन्द्र देख चुकें है जहाँ डंगर फिर रहें हैं,गोबर का ढेर है, चारों तरफ़ जंगल उगा हुआ है। केवल डाक्टर ही नही, दरवाज़े खिड़कियाँ भी ग़ायब हैं ! तीसरी लहर में यहाँ मैडिकल हैल्प कौन कैसे पहुँचाएगा? ग्रामीण क्षेत्र में ध्वस्त हो रहे मैडिकल इंफ़्रास्ट्रक्चर को बिलकुल तमाम होने से बचाने के लिए तत्काल क़दम उठाए जाने चाहिए। अगर कोरोना से लड़ना है तो सबसे बड़ी ज़रूरत टीकाकरण तेज़ करना है।सोमवार तक तो हमारे पास टीकाकरण की स्पष्ट नीति भी नही थी जिस पर सुप्रीम कोर्ट को भी फटकार लगानी पड़ी कि ‘टीकाकरण नीति मनमानी और तर्कहीन है’। मेरी जानकारी में किसी भी सरकार को बड़ी अदालतों से इतनी फटकार नही मिला जितनी इस सरकार को मिली हैं। केन्द्र और राज्य सरकारों में टीकाकरण को लेकर तू तू मैं मैं हो चुकी है। विदेशों से टीका प्राप्त करने के लिए राज्य सरकारें आपस में भिड़ चुकीं हैं। एक समय 12 राज्यों और 2 नगर निगमों ने वैक्सीन के लिए ग्लोबल टैंडर निकाले थे, सब  असफल रहे।

सुप्रीम कोर्ट की फटकार के एक सप्ताह बाद दिशा सही करते हुए  प्रधानमंत्री ने घोषणा की है कि केंद्र टीकाकरण को अपने पास वापिस ले रहा है। 18 साल की आयु से उपर सभी को मुफ़्त टीका लगाया जाएगा। केन्द्र ही टीका ख़रीदेगा और वह ही राज्यों को बाँटेगा। इस यू-टर्न का स्वागत है। आख़िर नीति की स्पष्टता नजर आने लगी है। प्रधानमंत्री ने अपनी सरकार की पीठ थपथपाई है और नीति की कलाबाज़ी के लिए राज्यों को ज़िम्मेवार ठहराया है। पंजाब सरकार मुनाफ़ाख़ोरी करते पकड़ी जा चुकी है। राज्यों के बारे शिकायत ग़लत नही पर कई सवाल अनुत्तरित रह गए हैं जैसे कि पिछले साल अप्रैल में विशेषज्ञों का ग्रुप क़ायम करने के बावजूद टीके के लिए अडवांस आर्डर क्यों नही दिए गए? अब विदेश मंत्री जयशंकर को अमेरिका भेजा गया लेकिन अधिकतर फ़ार्मा कम्पनियों के आर्डर पूरे बुक हो चुके हैं। अब दावा है कि जुलाई और दिसम्बर के बीच 108 करोड़ लोगों के लिए 216 करोड़ खुराक उपलब्ध हो जाएगी। अगर ऐसा हो जाता है तो बड़ी कामयाबी होगी पर अभी तक टीकाकरण अभियान बहुत आशा का संचार नही करता। इस वक़्त तो रोज़ाना 33 लाख के क़रीब टीके लग रहें हैं। इस रफ़्तार को तीन गुना बढ़ाने की ज़रूरत है नही  तो सभी को टीका लगाने के लक्ष्य तक पहुंचते बहुत वर्ष लग जाऐंगे। इंडियन  कांउसल ऑफ़ मैडिकल रिसर्च के विशेषज्ञों द्वारा तैयार की गई रिपोर्ट में कहा गया है कि ‘भारत की वैक्सीन उत्पादन और वितरण की नीति निम्न रही है’। मई में जहाँ केस 30 प्रतिशत बढ़े थे टीके 32 प्रतिशत घंटे थे।और दूसरी लहर भी अभी कहाँ रूकी है? ब्लैक फ़ंगस जैसी नई मुसीबत शुरू हो चुकी है। जो ठीक हो चुके है वह लम्बी बीमारी की शिकायत कर रहें है।

दूसरी बडी समस्या आर्थिक है। पहली लहर की तबाही के बाद अर्थ व्यवस्था कुछ सम्भली थी कि दूसरी लहर का धावा सहना पड़ गया। देश भर में करोड़ों लोगों की आमदन घटी है। लाखों बिसनेस बर्बाद हो चुकें हैं। 12 करोड़ से अधिक की नौकरियाँ चले गई है। केवल मई में 1.3 करोड़ रोजगार ख़त्म हुए हैं। अर्थ व्यवस्था -7.3 पर पहुँच चुकी है। बाक़ी दुनिया में भी समस्या है पर हमारे जैसी गिरावट तो कहीं देखने को नही मिल रही। बांग्लादेश का प्रदर्शन भी बेहतर है। नोटबंदी ने जो धक्का पहुँचाया उसे जीएसटी लागू करने में अकुशलता ने बढ़ाया और अब कोविड ने संकट को चरम पर पहुँचा दिया है। कुछ समय पहले तक हम दुनिया में सबसे तेज़ तरक़्क़ी करने वाले देशों में गिने जाते थे पर अब हम आर्थिक वृद्धि की रैंकिंग में लगातार गिर रहें है। मई में बेरोज़गारी की दर 11.9 हो गई थी। शहरों नें यह 15 प्रतिशत तक पहुँच रही हैं। पहली लहर में मिडल क्लास 9.9 करोड़ से गिर कर 6.6 करोड़ रह गई थी अब और गिरावट होगी। उपर से महँगाई हदें पार कर रही है। लेकिन एक आँकड़ा और भी है जो सरकार की नीति की दिशा पर सवाल खड़े करता है। जिस दौरान लोग बेरोज़गार हो रहे थे, कई बिसनेस के शट्टर डाउन हो रहे थे, शीर्ष 100 अरबपतियों की सम्पत्ति में 35 प्रतिशत का इज़ाफ़ा हुआ था। जब आम आदमी अपनी बर्बादी का मातम मना रहा था,जिन्हें ‘डालर मिलिनेयर’ कहा जाता है उनकी जायदाद दोगुना हो गई। हमने समाजवाद को बहुत पहले त्याग दिया था पर अब तो पूरी तरह से पूँजीवाद से चिपक गए लगतें हैं। अर्थ व्यवस्था को पटरी पर लाना बहुत कठिन काम रहेगा।

तीसरी चुनौती सबसे बड़ी है।  इस सरकार के प्रति विश्वास का संकट है। भरोसा टूट गया है। जिनके प्रियजन छूट गए उन्हे अहसास है कि केवल कोविड ही नही,सरकारी मिसमैनेजनैंट भी इसके लिए ज़िम्मेवार है। अप्रैल-मई के दौरान सरकारी बदइंतज़ामी के सार्वजनिक प्रदर्शन ने सरकार की छवि को भारी  क्षति पहुँचाई है। और यह देख कर कष्ट होता है कि अभी मुसीबत ख़त्म नही हुई कि कुछ लोग विजय घोषित कर श्रेय लेने में लगें हैं।किसी ने ख़ूब कहा है,

सियासत इस क़दर अवाम पर अहसान करती है,

पहले आँखें छीन लेती है फिर चश्में दान करती है!

क्या ऐसी गमगीन स्थिति में जब मौत का आँकड़ा साढ़े तीन लाख को पार कर चुका है क्या कोई किसी क़िस्म की  विजय का दावा कर सकता है? भविष्य को लेकर बहुत दहशत और अनिश्चय है। ऐसी हालत में जब लोगों के ज़ख़्म भरे नही, हज़ारों बच्चे अनाथ हो चुकें हैं, श्रेय लेना या बधाई देना तो अत्यन्त दुर्भाग्य पूर्ण है।औरअगर यह लहर उतर रही है तो अपनी मेहरबानी से उतर रही है। दूसरा हमारा टीकाकरण कितना भी तेज़ हो हमने केवल 3.5 प्रतिशत लोगों को ही दो डोज़ लगाए हैं। केवल 14 प्रतिशत ने ही एक डोज लगवाई है। अमेरिका और ब्रिटेन में यह आँकड़ा 40 प्रतिशत से अधिक है। वहां अब स्कूली बच्चों को टीका लगना शुरू हो गया है। यहाँ से अमेरिका में न्यू जर्सी गए एक मित्र ने बताया है कि वहां पहुँचने पर कोई कवारनटीन नही हुआ क्योंकि सारी आबादी को टीका लग चुका है। लोग तो मास्क भी नही डालते। हम बहुत पीछे हैं।

आख़िर में स्थिति को सम्भालने की ज़िम्मेवारी देश के नेता की है। राष्ट् के नाम प्रधानमंत्री मोदी कासम्बोधन अराजक स्थिति को ख़त्म करने की तरफ पहला क़दम हो सकता  है पर यह सम्बोधन भी डेढ़ महीने के बाद उस वक़्त आया है जब वायरस उतार पर है। यह डेढ़ महीना वह था जब सबसे अधिक तबाही हुई थी और उस वक़्त लोगों को जमीन पर अपनी सरकार नजर नही आई। राजनीति को एक तरफ रख कर कोरोना से लड़ाई लड़ी जानी चाहिए। राज्यों पर दोष लगाने से क्या प्राप्त होगा? इस माहौल में पश्चिम बंगाल से लक्ष द्वीप तक जो राजनीति खेली जा रही है वह चुभ रही है। नन्हें से लक्ष द्वीप को छेडने की ज़रूरत क्या है? यह भी स्वीकार करने की ज़रूरत है कि कुछ कमज़ोरियाँ रह गईं, कुछ ‘गफलत’ (मोहन भागवत का शब्द) हो गई। भाजपा के अपने स्वप्न दास गुप्ता जिन्हें फिर राज्य सभा भेजा गया है ने भी लिखा है कि इस वक़्त “नीति के प्रति स्पष्टता, पूरी ईमानदारी, जनता के साथ संवाद और नम्रता सबसे जरूरी हैं। यह मानना पड़ेगा कि कुछ ग़लतियाँ हुई हैं और उन्हे ठीक करना है”।

समय बहुत बलवान है पर यह भी जरूरी नही कि यह  आप के मुताबिक़ ही चले, और सारे ज़ख़्म भरजाएं। जो चले गए वह ज़रूर चले गए,पर अगर वह असमय चले गए, सरकारी लापरवाही से चले गए, पूरे सम्मान के बिना चले गए तो उनकी यादपरेशान करती रहेगी। आशा इस देश में बहुत दुर्लभ वस्तु बन चुकी है। इसे फिर से रोशन करने की ज़रूरत है।

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Chander Mohan is the grandson of the legendary editor of Pratap, Mahashya Krishan. He is the son of the famous freedom fighter and editor, Virendra. He is the Chief Editor of ‘Vir Pratap’ which is the oldest hindi newspaper of north west india. His editorial inputs on national, international, regional and local issues are widely read.