क्या ख़ूबसूरत जनादेश है, What A Beautiful Verdict

भारत की जनता ने अपना आदेश सुना दिया। क्या ख़ूबसूरत जनादेश है ! एकदम संतुलन क़ायम कर दिया। बता दिया कि लोकतंत्र, आज़ाद प्रेस, अभिव्यक्ति की आजादी सब में आम आदमीं की पूर्ण आस्था है,यह केवल मिडिल क्लास मूल्य ही नहीं है। यह बड़ा शोरगुल करने और उसे पसंद करने वाला देश है। किसी को ज़रूरत से अधिक शक्तिशाली नहीं देखना चाहते। जिनके पास 303 सीटें थीं लेकिन 370 की माँग कर रहे थे पर मिली 240, को ‘इंडिया’ गठबंधन की मार्फ़त इंडिया ने संदेश भेज दिया है कि उसे देश की राजनीतिक दिशा पसंद नही है! जो सरकार बनने जा रही है वह एनडीए की सरकार है मोदी सरकार नहीं। पर विपक्ष में जान डालते हुए भी बता दिया गया है कि इस अस्थिर गठबंधन को पहले अपना घर ठीक करना होगा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पश्चिम बंगाल में प्रचार करते हुए कहा था कि देश में बड़ा राजनीतिक भूचाल आएगा पर उन्होंने यह कल्पना नहीं की होगी कि कांग्रेस के मुख्यालय में भी ढोल बजेंगे। संसद के अंदर और बाहर विपक्ष और आक्रामक होगा। जिस तरह 140 विपक्षी सांसदों को एक साथ सदन से निकाल दिया गया था, ऐसा दोहराना अब सम्भव नहीं होगा। नरेन्द्र मोदी ने अपनी अजेयता की आभा खो दी है, जैसे न्यूयार्क टाइम्स ने भी टिप्पणी की है। बहुमत प्राप्त करने में उनकी नाकामी से उनका तीसरा कार्यकाल प्रभावित होगा। 

जनादेश सरकार और विपक्ष दोनो के लिए है। एक पार्टी के शासन के दिन फ़िलहाल लद गए। एक व्यक्ति की गारंटी पर भी विश्वास नहीं रहा। ‘वन नेशन वन पोल’ अर्थात् सारे देश में एक साथ चुनाव, और एक जैसा नागरिक क़ानून जैसे कार्यक्रम रूक जाएँगे। जिन प्रादेशिक पार्टियों पर निर्भरता है वह इजाज़त नहीं देंगी क्योंकि उन्हें माइनॉरिटी वोट की ज़रूरत है। नरेन्द्र मोदी के लिए गठबंधन चलाना नया अनुभव होगा। उनका स्वभाव भी अलग है। अभी तक वह अपनी पार्टी के बहुमत के बल पर डट कर शासन करते रहें हैं पर अब वह नीतीश कुमार और चन्द्र बाबू नायडू जैसे अविश्वसनीय साथियों पर निर्भर होंगे। यह समझौता आसान नहीं होगा। ऐसा जनादेश क्यों आया? इंडिया गठबंधन की 100 से अधिक सीटें बढ़ गईं और एनडीए की 60 के क़रीब कम हुई है। भाजपा बहुमत से 32 नीचे खिसक गई है और पिछली बार से 63 सीटें कम हुई हैं। बड़ा कारण है कि लोग अच्छी सरकार भी चाहतें हैं और  मज़बूत विपक्ष भी। विपक्ष के नेताओं के पीछे सरकारी एजंसियों को छोड़ने से ग़लत संदेश गया है। भाजपा के अंदर दूसरी पार्टियों के बदनाम नेताओं की भर्ती से भी गलत संदेश गया है। लोग नही चाहते कि विपक्ष को मसल दिया जाए। वह ‘कांग्रेस मुक्त’ या विपक्ष मुक्त भारत नहीं चाहते। कांग्रेस की सीटें दोगुनी कर जनता ने यह स्पष्ट भी कर दिया। चुनाव के दौरान जैसी हल्की भाषा का इस्तेमाल किया गया उसे भी पसंद नहीं किया गया।

यह चुनाव बता गए कि अब हिन्दू-मुसलमान का मुद्दा नहीं चलता। यह केवल उन्हीं को प्रभावित करता हैं जो पहले ही पक्के हैं। ध्रुवीकरण का प्रयास सफल नहीं हुआ। सड़क चलता आदमी कह रहा है कि मंदिर -मस्जिद बहुत हो चुका इसीलिए मंगलसूत्र या मटन या मुजरा जैसे मुद्दे लोगों को अछूते छोड़ गए हैं। इसका उल्टा प्रभाव यह हुआ कि मुसलमान जो पिछले चुनावों में बंट कर वोट डालते रहे,ने इस बार एकजुट हो कर भाजपा के खिलाफ वोट डाला है। भाजपा को बड़ा धक्का उतर प्रदेश में लगा है जहां समाजवादी पार्टी और कांग्रेस ने मिल कर बड़ा खेला कर दिया। भाजपा अध्यक्ष जे पी नड्डा का राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ को दिया कड़ा संदेश की ‘अब हम सक्षम हैं’, महँगा पड़ा लगता है। पार्टी के अंदर से भीतरघात की शिकायतें जो सुनने को मिल रही हैं, वह तनाव पैदा करेंगी। ‘यूपी के लडकों’ ने कमाल कर दिखाया। किसान आन्दोलन, बेरोज़गारी और अग्निपथ जैसी योजनाओं ने असंतोष का माहौल तैयार कर दिया जो अखिलेश यादव और राहुल गांधी भुनाने में सफल रहे। यह डब्बल इंजन चल निकला। समाजवादी पार्टी सबसे बड़ी पार्टी बन कर उभरी है पर इससे भी बडी ख़बर कांग्रेस का देश भर में पुनरूत्थान है। बहुत समय के बाद पार्टी 100 तक पहुँच सकी है। यह भी उल्लेखनीय है कि अयोध्या जिस फ़ैज़ाबाद चुनाव क्षेत्र में स्थित है और जहां जनवरी मे राम मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा हो कर हटी है, वहाँ भाजपा हार गई। भावनात्मक मुद्दों के उपर लोगों नें रोज़मर्रा के मसलों को प्राथमिकता दी है।

 मंहगाई और बेरोज़गारी बहुत बड़े मसले हैं। प्रधानमंत्री और उनके सहयोगियों की सोच है कि जैसे जैसे अर्थव्यवस्था बढ़ेगी रोज़गार खुद बढ़ जाएगा। पर परेशान 18-35 वर्ष के युवा इंतज़ार करने के लिए तैयार नही है। अग्निपथ योजना जिसके बारे मैं भी सावधान करता रहा हूँ, से भी युवा खफा हैं। राजहठ छोड़ इसमे सुधार करना चाहिए। राहुल गांधी का वायदा कि उनकी सरकार आते ही वह इसे रद्द कर देंगे, काम आया लगता है। युवाओं की बेचैनी और सड़क पर ग़ुस्से को भाजपा नेतृत्व पहचान नहीं सका। रिसर्व बैंक के पूर्व गवर्नर सी.रंगाराजन ने लिखा है ‘रोज़गार के बिना विकास’ चिन्ता का विषय है। सरकार बताती रहती है कि हमारी अर्थव्यवस्था इतनी बढ़ गई, विश्व में पाँचवीं हो गई, पर इससे ग़रीबों और बेरोज़गारों का पेट नहीं भरता।

बहुत समय से गांधी भाई-बहन का मज़ाक़ उड़ाया जाता रहा। कभी ‘पप्पू’ तो कभी ‘युवराज’ तो कभी ‘राहुल बाबा’ कहा गया। इसका जवाब दे दिया गया है। कांग्रेस के पुनरूत्थान और विपक्षी एकता की नींव राहुल गांधी की दो यात्राओं ने डाली थी। पहली बार देश ने उनके व्यक्तित्व के संवेदनशील पक्ष को देखा और पसंद किया। इंडिया गठबंधन में भी खुद को पीछे रख उन्होंने मलिक्कार्जुन खड़गे को आगे किया ताकि आलोचना न हो। संविधान ख़तरे में है का नारे दे कर उन्होंने भाजपा को रक्षात्मक बना दिया और पहल भाजपा के हाथ से खिसक गई। क्रिकेट की भाषा में, भाजपा को अपनी पिच पर खेलने पर मजबूर कर दिया। यह कह कर कि भाजपा 400 पार इसलिए चाहती है क्योंकि वह अम्बेडकर का संविधान बदल कर आरक्षण ख़त्म करना चाहती है, राहुल गांधी ने दलितों को अपने पक्ष में मोड़ लिया। अब जनता ने संविधान बदलने का अधिकार ही छीन लिया। न दो तिहाई बहुमत होगा, न संविधान ही बदला जाएगा। अडानी और अम्बानी उछाल कर राहुल गांधी बढ़ रही ग़ैर-बराबरी को राजनीति के केन्द्र में स्थापित करने में सफल रहें।

राहुल गांधी का उत्थान हमारी राजनीति की महत्वपूर्ण घटना है। वह विपक्ष के नेता बन सकते है। उनके ख़िलाफ़ जो प्रचार किया गया वह सब उल्टा पड़ा। उनका विरोध करने के लिए अब नई शब्दावली घढनी पड़ेगी।  लेकिन अब राहुल गांधी को भी झिझक छोड़ कर दोनों हाथ से ज़िम्मेवारी सम्भालनी चाहिए। जैसे कहा गया है,

                 ग़र पार उतरना है तो मौजों से खेलो

                 कहाँ तक चलोगे किनारे किनारे

पर राहुल गांधी को जाति जनगणना का मामला सोच कर उठाना चाहिए। ‘जितनी आबादी उतना हक़’ वह बंदूक़ है जो दोनों तरफ़ फ़ायर करती है। मेरिट को तिलांजलि दे कर देश तरक़्क़ी नहीं कर सकता। वी. पी.सिंह तो चाहते थे कि डाक्टर भी जाति के मुताबिक़ चुने जाऐं पर जब खुद को किडनी की तकलीफ़ हुई तो करदाता के खर्चे पर लंडन भाग गए थे। राहुल क्या चाहते हैं कि जो डाक्टर इलाज करें या जो पायलट जहाज़ उड़ाए वह अपनी क्षमताओं अनुसार चुनें जाऐं या जाति अनुसार?  

भाजपा के लिए उड़ीसा से अच्छी खबर है जहां बीमार नवीन पटनायक की पार्टी हार गई और भाजपा की एक और सरकार बनने वाली है। भाजपा के लिए अच्छी खबर पूर्व भारत से ही है जहां सहयोगी चन्द्र बाबू नायडू की आंध्र प्रदेश में सरकार बनने जा रही है। टीडीपी के 16 सांसद सरकार बनाने में निर्णायक भूमिका निभा सकते है। कांग्रेस के लिए पूर्व भारत विशेष तौर पर पश्चिम बंगाल, उड़ीसा और आंध्र प्रदेश चुनौती है जहां उसकी उपस्थिति मामूली है। दिल्ली,गुजरात, मध्यप्रदेश,उतराखंड और हिमाचल प्रदेश में भी कांग्रेस कमजोर रही है। हिमाचल में तो उनकी अपनी सरकार है जो अब और कठिनाई में फँसेगी। बचाव यह रहा है कि साथ हुए 6 विधानसभा उपचुनाव में से कांग्रेस 4 जीतने में सफल रही। आप और अरविंद केजरीवाल के लिए बड़ा धक्का है क्योंकि केजरीवाल ने कहा था कि ‘अगर दिल्ली वाले चाहते हैं कि में बाहर आ जाऊँ तो आप को वोट दो’। भाजपा वहाँ 7-0 से विजयी रही है। महाराष्ट्र में भाजपा द्वारा शिवसेना और एनसीपी को तोड़ना महँगा साबित हुआ है। बिहार का परिणाम हैरान करने वाला है। नीतीश कुमार की कलाबाज़ी के बावजूद लोगों ने उन्हें अच्छा समर्थन दिया है। नायडू की तरह वह भी किंग मेकर की श्रेणी में आगए हैं।

नरेन्द्र मोदी तीसरी बार प्रधानमंत्री बनने जा रहे हैं जो कीर्तिमान उनसे पहले केवल जवाहरलाल नेहरू को ही प्राप्त था। पर एक बड़ा अंतर है। नेहरूजी के पास 494 में से अपने 361 सांसद थे जबकि नरेन्द्र मोदी की पार्टी बहुमत के लिए दूसरों पर निर्भर हैं जिसमें नीतीश कुमार  और चन्द्र बाबू नायडू जैसे लचकदार लोग शामिल है। ग्रामीण तनाव, महंगाई और बेरोज़गारी के बड़े मुद्दे हैं। चीन फिर तंग कर सकता है। पंजाब से चिन्ताजनक समाचार है कि उग्रवादी पृष्ठभूमि वाले दो उम्मीदवार जीत गए हैं। यहाँ कांग्रेस से व्यापक दलबदल करवाने के बावजूद भाजपा का सफ़ाया हो गया। पंजाब की सुध लेने की ज़रूरत है नहीं तो यह फिर समस्या बन सकता है। ख़ुशी है कि चुनावी लोकतंत्र ज़िन्दा है और सभ्य तरीक़े से बिना हिंसा के नई सरकार बनने जा रही है। लेकिन परिदृश्य बदल गया। विपक्ष को अपनी लापता आवाज़ मिल गई और नरेन्द्र मोदी को सत्ता पकड़ाते हुए भी जनता ने सावधान कर दिया कि आख़िर में हम मालिक है। ग़ज़ब का जनादेश है कि न कोई हारा है, पर न ही कोई जीता है! अगर जीत हुई है तो जनता के विवेक की।

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About Chander Mohan 716 Articles
Chander Mohan is the grandson of the legendary editor of Pratap, Mahashya Krishan. He is the son of the famous freedom fighter and editor, Virendra. He is the Chief Editor of ‘Vir Pratap’ which is the oldest hindi newspaper of north west india. His editorial inputs on national, international, regional and local issues are widely read.