निराशाजनक वर्ष का आशापूर्ण समापन, Hopeful Ending To A Disappointing Year

 नया साल शुरू हो रहा है। यह अहसास है कि देश कितना बदल गया !यह वह भारत नहीं रहा जिसमें हम जन्मे पले थे। हमने तो वह समय भी देखा है जब फ़ोन पर बात करने के लिए पहले एक्सचेंज पूछता था, “नम्बर प्लीज़”। फियट कार लेने के लिए मुख्यमंत्री की चिट चाहिए थी। देश भुखमरी से भी गुज़रा था और अमेरिका से सहायता माँगनी पड़ी थी। चीन से मार खाई थी पर बांग्लादेश भी बनवाया था। तब से लेकर अब तक खान-पीन, रहन-सहन सब सुधर गया। सर्दी में उत्तर भारत में लगभग हर कोई जैकेट में नज़र आता है। भारत एक उभरती ताक़त है जो दुनिया मान भी रही है, और कई देश रूकावटें खड़ी करने की कोशिश भी कर रहें हैं। आपरेशन सिंदूर में भावलपुर और मुरीदके के आतंकी ठिकानों को तबाह कर हमने वह बदला लिया जो हम मुम्बई पर 26/11 के हमले के बाद नहीं ले सके। आपरेशन सिंदूर हमारे रणनीतिक सफ़र में एक महत्वपूर्ण मील पत्थर रहेगा।

डानल्ड ट्रम्प ने हम पर नाजायज टैरिफ़ लगाया पर हम झेल गए। हमने बता दिया कि हमारी विदेश नीति दिल्ली में तय होगी, न कि वाशिंगटन में या किसी और राजधानी में। हमने आस्ट्रेलिया,ओमान,यूएई,न्यूज़ीलैंड से मुक्त व्यापार समझौता(एफ़टीए) कर लिया है पर कई चरण की बातचीत के बावजूद अमेरिका से नहीं किया क्योंकि उनकी शर्तें मंज़ूर नहीं है। ट्रम्प को भी समझ आगई है कि भारत की बाँह मरोड़ना आसान नहीं है। उनके ट्रेड रेप्रज़ेन्टटिव जेमीसन गरीर ने तो माना है कि, “इंडिया टफ नट टू क्रैक”, अर्थात् भारत को तोड़ना कठिन है। ट्रम्प ने कोशिश की थी कि उनकी आईटी कम्पनियाँ भारत न आएँ पर असफल रहे क्योंकि 1, दुनिया की चौथी बड़ी अर्थव्यवस्था को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता।2, भारत का अपना मार्केट विशाल है और 3, हमारे पास चीन के बाद पढ़े लिखें लोगों की सबसे अधिक तादाद है।

हाल ही में कई बड़ी आईटी कंपनियों ने भारत में निवेश किया है। न्यूयार्क टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार माइक्रोसॉफ़्ट, मेटा, गूगल,एमेजौन जैसी कम्पनियाँ यहाँ 67.5 अरब डॉलर का निवेश करने जा रही हैं। यह ट्रम्प टैरिफ़ के बावजूद इन कम्पनियों का भारत की अर्थव्यवस्था की मज़बूती मे विश्वास भी प्रकट करता है। न्यूयार्क टाइम्स ने भारत के बारे लिखा है कि “यह देश खुद को डेटा और एआई इंफ़्रास्ट्रक्चर के ग्लोबल हब के सैंटर में स्थापित कर रहा है”।  2014 के बाद हमारी अर्थव्यवस्था दोगुनी हो चुकी है। 7-8% की विकास दर बहुत सराहनीय है। अभी बहुत रास्ता तय करना है, पर अर्थ व्यवस्था के क्षेत्र में प्रगति पर यह सरकार अपनी पीठ थपथपा सकती है। इसलिए हैरानी है कि देश को भविष्य के लिए तैयार करने की जगह पीछे की तरफ़ ले जाने की कोशिश की जा रही है। बार बार वह मुद्दे उठाए जा रहें हैं जिनका आज की चुनौतियों से कोई ताल्लुक़ नहीं है, और जो समाज में तनाव पैदा कर रहें हैं

हाल ही में तमिलनाडु में  मदुरै के नज़दीक थिरूप्परनकुंद्रम मंदिर में दीपक जलाने पर विवाद हो गया है। इसी के पास एक दरगाह है। 100 वर्षों से दीपक दरगाह से दूर जलाया जाता आ रहा है। अब माँग उठी है कि इसे दरगाह के नज़दीक पत्थर के दीपक स्तम्भ पर जलाए जाने की इजाज़त दी जाए, जो मद्रास हाई कोर्ट ने दे भी दी। इसे तमिलनाडु की सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है। मैं इस मामले की बहुत जानकारी नहीं रखता पर सवाल तो है कि अचानक यह मामला जिसे प्रदेश से बाहर कोई जानता नहीं था, ज्वलंत कैसे हो गया?  मोहन भागवत ने तो कहा था कि हमें हर मस्जिद के नीचे शिवलिंग नहीं ढूँढना चाहिए, पर संघ परिवार के एक नेता ने तो इसे ‘दक्षिण की अयोध्या’ बनाने की धमकी दे है। चिन्ता यह है कि देश में ऐसे विवादों का ढेर है। क्या जहां भी चुनाव होने होंगे वहाँ ऐसा मसला उठा लिया जाएगा?

पिछला साल यह बहुत विचलित करने वाला संदेश दे गया है कि चुनावी फ़ायदे के लिए पूराने भूले हुए विवादों को रंग रोगन दे कर फिर पेश किया जा रहा है। सांस्कृतिक उद्धार होना चाहिए पर यह लोगों को लड़ा झगड़ा कर नहीं होना चाहिए। क्रिसमस पर प्रधानमंत्री मोदी ने चर्च जा कर प्रार्थना की। धार्मिक सहिष्णुता और सह अस्तित्व का बढ़िया उदाहरण पेश किया पर इसी क्रिसमस पर बजरंग दल और विश्व हिन्दू परिषद के कुछ लोगों ने कई प्रदेशों में दंगा किया। मोहन भागवत भी बहुत अच्छी अच्छी बातें करते हैं पर इन संगठनों के अराजक कार्यकर्ताओं पर नियंत्रण करने का प्रयास क्यों नहीं किया जा रहा ? जो संस्कारों की बात करते नहीं थकते उनके संगठनों में कुलदीप सैंगर जैसे रेपिस्ट उच्च पदों तक कैसे पहुँच रहें है?

निश्चित तौर पर यह वह देश नही जिस में हम पले और बड़े हुए थे। दंगे तब भी होते थे पर उन्हें व्यवस्था की मूक सहमति प्राप्त नहीं थी। अब एक वर्ग को प्रभाव दिया जा रहा है कि वह बराबर के नागरिक नहीं है। अगर अपराधियों के घरों पर बुलडोज़र चलना है तो यह क्यों देखा जा रहा है कि यह घर हिन्दू का है या मुसलमान का? हम बांग्लादेश में हिन्दुओं पर हो रहे हमलों से जायज़ विचलित है पर हमारे यहाँ भी तो अल्पसंख्यकों पर हमले हो रहें हैं। एक नया नफ़रती भारत उभर रहा है। नफ़रत राजनीतिक हथियार बनती जा रही है। बरेली में बर्थडे मना रही नर्सिंग छात्राओं पर बजरंग दल के कार्यकर्ताओं ने हमला कर दिया और पिटाई कर दी। कैफ़े के मैनेजर के अनुसार अंदर आते ही उन्होंने पूछा, “मुसलमान कौन है, और मारपीट शुरू कर दी”। ऐसे तत्व क्यों समझने लगे हैं कि वह समाज के ठेकेदार है और क़ानून को हाथ में लेने का उन्हें अधिकार है? देहरादून में त्रिपुरा के एंजल चकमाँ को ‘चिंकी’ कह कर पीट पीट कर कुछ युवकों ने मार दिया। वह कहता रहा “मैं भी इंडियन हूँ”।उत्तर पूर्व को क्या संदेश दिया जा रहा है? ऐसी हिंसा सामान्य क्यों हो रही है?

 ऐसे हमले चाहें धर्म के आधार पर हो, या जाति या नस्ल के आधार पर हों, देश को कमजोर करते हैं। हमने  बांग्लादेश या अफ़ग़ानिस्तान या पाकिस्तान नहीं बनना। ऐसा माहौल क्यों बन गया है कि अतीत की ज़्यादतियों को लेकर वर्तमान में हम अपने ही सह-नागरिकों से नफ़रत करने लगे हैं? अच्छे आर्थिक संकेतक, सैनिक शक्ति, लोकतांत्रिक चुनाव के बावजूद देश में बेचैनी है। जिसे ‘आइडिया ऑफ इंडिया’ कहा जाता है, उसे बदलने की ज़बरदस्त कोशिश हो रही है। ‘मनरेगा’ का नाम बदल कर ‘जी-राम-जी’ रखना इसी प्रक्रिया का हिस्सा है। सड़क पर तनाव नज़र आ रहा है। यह क्यों समझा जा रहा है कि आगे बढ़ने के लिए पिछले बैर को जीवित रखने की ज़रूरत है? वर्तमान सरकार अपनी कामयाबियों पर गर्व कर सकती है इसलिए समझ नहीं आता कि पुराने बैर को उछलने से रोकती क्यों नहीं? राष्ट्र भविष्य की तरफ़ देख कर प्रगति करते है, अतीत के गढ़े मुर्दे उखाड़ कर नही। बहुत सी बुनियादी समस्या ,रोज़गार,महंगाई, कमजोर शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाएँ,प्रदूषण, स्वच्छ पानी की ज़रूरत आदि अभी क़ायम है। रूपया कमजोर हो रहा है। पहलगाम की दर्दनाक घटना और लाल क़िला के बाहर विस्फोट बताता है कि दुष्मन सक्रिय है लेकिन देश का ध्यान हिन्दू-मुसलमान या हिन्दू -ईसाई पर लगाया जा रहा है।

 चुनाव जीतना ही पर्याप्त नहीं है। आप समाज कैसा बना रहे हो? पिछला साल कई प्रकार की दरारें नंगी कर गया है। धर्म और जाति को लेकर जो इतना तनाव उभर रहा है वह पहले नहीं देखा था। हमें नफ़रत नहीं सिखाई गई थी, जो आज नियंत्रण से बाहर हो रही है। राजनीति से उपर उठ कर देश के दीर्घकालिक हित में फ़ैसले लिए जाने चाहिए। सही कहा गया है कि राजनीतिज्ञ अगले चुनाव के बारे सोचतें है, स्टेट्समैन अगली पीढ़ी के बारे। जब अजमेर शरीफ़ को लेकर कुछ उग्रवादियों ने विवाद खड़ा करने की कोशिश की तो प्रधानमंत्री मोदी ने वहाँ चादर भेज कर विवाद की हवा निकाल दी। ऐसे और प्रयास चाहिए। प्रधानमंत्री मोदी के पास वह राजनीतिक वज़न और लोकप्रियता है जिसे वह देश को सही दिशा देने के लिए इस्तेमाल कर सकते हैं। आज अटल जी याद आतें हैं जिन्होंने कहा था, “सरकारें आएंगी,जाएंगी, पार्टियाँ बनेगी,बिगड़ेंगी। मगर यह देश रहना चाहिए”।

2025 में एक और कमजोरी सामने आई। संसद अब बहुत प्रभावी नहीं रही। शशि थरूर ने तो कहा है कि “संसद के पूरे पतन की सम्भावना बन रही है”। यह तो अतिशयोक्ति लगती है, पर रोज हंगामे होते हैं पर लोगों की ज़रूरी समस्याओं पर बहस नहीं होती। एक महिला सांसद तो आवारा कुत्ते को संसद ले आईं। संसद में ई-सिगरेट पीने की भी शिकायत उठी है। कोविड के बाद प्रदूषण सेहत के लिए सबसे बड़ा ख़तरा बन गया है।  पर जिस संसद ने 150 साल पुराने वंदे मातरम पर 10 घंटे बहस की उसके पास प्रदूषण पर बहस करने का समय नहीं था। कैसे ‘जन प्रतिनिधि’ हैं यह? शायद वह अपने अपने एयर प्योरिफायर में मुग्ध हैं! पर वर्ष का अंत आशा भी दे गया है। अरावली पहाड़ियों के बारे सुप्रीम कोर्ट ने अपने ही फ़ैसले पर रोक लगा दी। अब 100 मीटर से कम पहाड़ियों पर खनन नहीं होगा। उन्नाव के कुख्यात रेप केस में भी कुलदीप सैंगर को मिली ज़मानत पर रोक लगा दी गई है। मुख्य न्यायाधीश का कहना है कि जजों से भी गलती हो सकती है। यह  न्यायिक नम्रता का सराहनीय प्रदर्शन है। यह दो प्रकरण यह सुखद संदेश भी दे गए कि अगर सिविल सोसायटी ज़ोर लगाए तो वह अड़ियल व्यवस्था पर रोक लगा सकती है।

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Chander Mohan is the grandson of the legendary editor of Pratap, Mahashya Krishan. He is the son of the famous freedom fighter and editor, Virendra. He is the Chief Editor of ‘Vir Pratap’ which is the oldest hindi newspaper of north west india. His editorial inputs on national, international, regional and local issues are widely read.