पाँच विधानसभा के चुनाव बतातें हैं कि भाजपा न केवल 2024 के आम चुनाव में मिले झटके से उभर चुकी है बल्कि अब वह देश के पूर्व में सबसे ताकतवर राजनीतिक शक्ति है। पहले ही वह उड़ीसा, बिहार और असम में सत्तारूढ़ है अब बंगाल का महत्वपूर्ण क़िला भी उन्होंने फ़तह कर लिया है। कुछ साल पहले तक यह नामुमकिन समझा जाता था। अपनी चुनावी मशीनरी और योजना से वह जिसे बंगाल में ‘पौरिबरतन’ कहतें हैं,करने में सफल रहें हैं। नेतृत्व ने ज़मीनी स्तर तक अपना नेटवर्क तैयार किया और यह प्रभाव ख़त्म करने में सफल रहे कि वह बाहरी है और बंगला संस्कृति को ख़त्म कर देंगें। जिन्हें बंगाली भद्रलोक कहा जाता है और जो कभी ज्योति बसु के भक्त रहें हैं, और बाद में ममता बैनर्जी के साथ आगए थे, ने अब भाजपा को अपना लिया लगता है।
भाजपा बहुत देर से अखिल भारतीय पार्टी बनने की कोशिश कर रही थे। रूकावट बंगाल, पंजाब और दक्षिण हैं। बंगाल में तो खेला हो गया। यह नरेन्द्र मोदी और अमित शाह की जोड़ी की बड़ी कामयाबी है जो ममता बैनर्जी जैसी जुझारू नेता को हराने में कामयाब हो गए हैं। दक्षिण अभी पहुँच से बाहर लगता है। पर उनकी राजनीतिक धुन की दाद देनी चाहिए। बंगाल की जीत में चुनाव आयोग द्वारा पैदा की गई अफ़रातफ़री का कुछ हाथ हो सकता है पर जितनी जीत है वह बताती हैं कि लोग ममता बनर्जी के शासन से तंग आ चुके थे।ममता 2011 से सीएम है। पार्टी की सारी राजनीतिक उनके इर्द-गिर्द घूमती है। उन्होंने घोषणा भी की कि सभी 294 सीटों पर वह ही उम्मीदवार हैं। ऐसा कर वह अपनी पार्टी की धाँधलियों, हिंसा और भ्रष्टाचार से उसे बचाना चाहती थीं। पर बात नहीं बनी।
उनका अपना लाइफ़स्टाइल बिलकुल सादा है। वहीं हवाई चप्पल और सूती साड़ी। पंद्रह साल सता में रहने के बावजूद अपने पुराने तीन कमरों के घर में रहतीं हैं। अपने लिए कोई शीशमहल नहीं बनवाया। लेकिन यही हाल उनकी पार्टी का नहीं है। टीएमसी को व्यापक रूप से भ्रष्ट, अराजक,हिंसक और शोषक समझा जाता है। चाहे सारदा या नारदा जैसे घोटाले हों या आरजी कार मैडिकल अस्पताल की डाक्टर के साथ बलात्कार और हत्या की शर्मनाक घटना हो, ममता बनर्जी की प्रतिक्रिया अगम्भीर रही है। बहुत शिकायतें हैं कि टीएमसी के लोकल नेताओं ने अपने सिंडिकेट बनाए हुए है और हर काम का पैसा माँगते हैं। ममता के 15 साल के शासन में पश्चिमी बंगाल का औद्योगिक पतन हुआ है। जहां सब बड़े शहर, दिल्ली, मुम्बई, चेन्नई, हैदराबाद, अहमदाबाद, बैंगलोर ने प्रगति की है वहाँ कोलकाता की प्रगति रुक गई लगती है। बेरोज़गारी बढ़ी है। उन्होंने चुनाव को ‘बंगाली अस्मिता’ बचाने का मुद्दा बनाने का प्रयास किया। दो चुनावों में यह रणनीति काम आई। इस बार असफल रहीं। उन्होंने तो यहाँ तक कह दिया कि “वह आपको मीट, मछली और अंडे नहीं खाने देंगे। अगर खाओगे तो आपको बांग्लादेशी करार दिया जाएगा”। भाजपा को इसका जवाब देने के लिए असम के मुख्यमंत्री हेमंता बिस्वा सरमा को वहाँ भेजना पड़ा। उनकी तो चुनौती थी कि वह ममता से दो क़िले अधिक मीट खा कर दिखाएँगे !
पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु और केरलम में लोगों ने सत्तारूढ़ दलों को उखाड़ कर जो विकल्प नज़र आता है, को वोट दिया है। यह हमारी पुरानी परम्परा है कि हम विकल्प की तलाश कर लेतें है। तमिलनाडु में जनता दोनों द्रमुक और अन्नाद्रमुक से असंतुष्ट थी। कांग्रेस क्योंकि द्रमुक से जुड़ी हुई थी इसलिए उसे विकल्प नहीं समंझा गया और एक लोकप्रिय अभिनेता विजय, की पार्टी टीवीके को दो साल में खड़ा कर दिया। पर विजय की विजय भी एक संदेश देती है। बंगाल और असम में जीत को भाजपा ने हिन्दू एकजुटता बताया है पर यह उल्लेखनीय है कि तमिलनाडु जो बहुत धार्मिक प्रदेश है, यहाँ लोग ने उस विजय को समर्थन दिया जिनका नाम जोसफ़ विजय चन्द्रशेखर है, अर्थात् ईसाई हैं। इसे सैक्यूलरिजम की मिसाल ही समझा जाना चाहिए जो उत्तर, पश्चिम और पूर्व भारत से लुप्त होता जा रहा है। तमिलनाडु में फ़िल्म स्टार एम जी रामाचन्द्रम और जयललिता दोनों सीएम रहे हैं, पर रजनीकांत और कमल हसन प्रयास कर हार चुकें हैं।
तमिलनाडु, और केरलम दोनों के परिणाम सत्तारूढ़ पाटियाँ के खिलाफ गएं हैं पर यह विडम्बना है कि दोनों ही प्रदेश बेहतर शासित प्रदेशों में गिने जाते है। तुलना में यह उत्तर भारत के प्रदेशों से कहीं बेहतर हैं। देश के कुल पंजीकृत कारख़ानों में से 15% केवल तमिलनाडु में हैं। एप्पल फ़ोन तमिलनाडु में श्रीपेरमबूदर में बनते है। ह्युनडाई, बीएमडब्लू, टाटा कार उत्पादक सब यहाँ है।ह्युनडाई वहाँ लगभग 45000 करोड़ रूपए का निवेश करने जा रही है। तमिलनाडु देश के ग्रोथ इंजन का काम कर रहा है पर परिवार वाद और भ्रष्टाचार द्रमुक को मार गया। इसी तरह केरलम कई मामलों में सबसे बेहतर प्रशासित प्रदेश है। शिक्षा जैसे क्षेत्रों में यह प्रदेश सबसे आगे है। पर लोगों ने नकार दिया क्योंकि समझा गया कि वामदल अपने सिद्धांतों से दूर चले गए है। केरलम में पराजय का एक और संदेश है। वामदलों का सूर्यास्त हो रहा है। 1960 के बाद पहली बार देश में कहीं भी वामदलों की सरकार नहीं होगी। लम्बी अवधि के शासन ने जड़ता और दूसरी कमज़ोरियाँ पैदा कर दी। नए भारत के लिए इनके पास कोई नया प्रोग्राम नहीं था।
असम में भाजपा की भारी जीत हैरान करने वाली नहीं है। चाहे प्रियंका गांधी को प्रभारी बनाया गया पर कांग्रेस मुक़ाबला नहीं कर सकी जो तरुण गगोई की हार से पता चलता है। हिमंता बिस्वा सरमा की नक़दी स्कीमें बहुत लोकप्रिय हैं। पिछले महीने असम की लगभग 40 लाख महिलाओं को 9000 रूपए भेजे गए। इसे ‘मामा’ के उपहार कहा गया। पहले ही हर परिवार को 1250 मासिक मिल रहा है। सब राजनीतिक दल महिलाओं को अपना अपना वोट बैंक बनाने की कोशिश कर रहें हैं पर हर चुनाव के साथ नकदी बढ़ती जाएगी और एक दिन सम्भालना मुश्किल होगा। बांग्लादेश के ‘घुसपैठियों’ का मामला भड़काना आसान रहता है।असम और बंगाल दोनों में वह भाजपा का काम आया। पर अब समस्या है। जैसे कोलकाता से वरिष्ठ पत्रकार शिखा मुखर्जी ने भी लिखा है, “भाजपा को अब देखना होगा कि जिन्हें एसआईआर में घुसपैठिए करार दिया गया है को कहाँ निर्वासित किया जाए? बांग्लादेश ने तो स्पष्ट कर दिया है कि भारत में कोई बांग्लादेशी घुसपैठिए नहीं हैं”। वह देश इन्हें वापिस नहीं लेगा।
इन चुनावों का एक और पहलू चुनाव आयोग की भूमिका रही है। लाखों लोग बंगाल में वोट नहीं डाल सके क्योंकि कागज नही थे। विडम्बना यह है कि कई चुनाव अधिकारी शिकायत कर रहें हैं कि उनका वोट नहीं है। अभी तक चुनाव आयोग लोगों को शामिल करने में लगे रहतें थे। यह पहला चुनाव है जहां लोगों को निकालने पर ज़ोर दिया गया। अगर एसआईआर जैसी योजना चलानी थी तो लोगों को अपनी नागरिकता सिद्ध करने के लिए पर्याप्त समय दिया जाना चाहिए था। बहुत लोग दूसरे प्रदेशों में काम करते हैं। जिनको निकाला गया उन्हें पर्याप्त स्पष्टीकरण भी नहीं दिया गया। लोकतंत्र में अचानक लाखों लोगों को वोट के अधिकार से वंचित करना बहुत ख़तरनाक है। जैसे पूर मुख्य चुनाव आयुक्त एसवाई क़ुरैशी ने लिखा है, “वोट का अधिकार एक नागरिक का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक अधिकार है। कोई भी अभियान जो इस अधिकार को कमजोर करता है को ..संवैधानिक तौर पर जायज़ नही कहा जा सकता”। सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि “सबसे बहुमूल्य वोट का अधिकार है। हम शिकायतों को देखेंगे”। अफ़सोस कि फिर भी लाखों भारतवासी वोट के अधिकार से वंचित रह गए।
इन चुनावों का राजनीतिक प्रभाव क्या होगा? भाजपा एक के बाद एक प्रदेश जीत रही है। महाराष्ट्र में शिवसेना और एनसीपी का विभाजन हो चुका है। आप दिल्ली खो चुकी है और अब उनके 7 राज्य सभा सांसद भाजपा में शामिल हो चुकें हैं। बिहार में आरजेडी पराजित है और जेडीयू भाजपा की जेब में है। अब बंगाल में टीएमसी के साथ खेला हो गया है! वाम तमाम हो चुकें हैं। इस वक़्त देश का 72% हिस्सा, 78% जनसंख्या, 20 प्रदेश भाजपा के पास है। केरलम में ज़रूर कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूडीएफ़ को भारी जीत मिली है पर यह प्रदेश लोकसभा में केवल 20 सांसद ही भेजता है। इंडिया गठबंधन जो पहले ही लड़खड़ा रहा था अब और कमजोर हो गया है क्योंकि दो बड़े स्तम्भ ,स्टालिन और ममता चुनाव हार गए है। विपक्ष के नेताओं की पहली पंक्ति कमजोर हो गई है। अरविंद केजरीवाल पराजित हैं और नवीन पटनायक और नीतीश कुमार धीरे धीरे हाशिए की तरफ़ जा रहे हैं।कांग्रेस को शायद तमिलनाडु में टीवीके को साथ सरकार बनाने का मौक़ा मिल जाए पर उन्हें ज़रूर मंथन करना चाहिए कि असम में जहां भाजपा के साथ सीधा मुक़ाबला था, वह 81 सीटें पीछे क्यों रह गई? शासन विरोधी भावना का फ़ायदा क्यों नहीं मिला? वह तो तमिलनाडु के साथ लगती पुडुचेरी में भी पिछड़ गई।
इंडिया गठबंधन में अब दो ही बड़ी पार्टियाँ रह गईं है, कांग्रेस और समाजवादी पार्टी। अगले साल उत्तर प्रदेश के चुनाव हैं। भाजपा के निशाने पर अखिलेश यादव होंगे। क्या हम विपक्ष मुक्त भारत की तरफ़ चल रहें है? अगर ऐसा होता है तो बहुत दुर्भाग्यपूर्ण होगा क्योंकि तब लोकतंत्र ख़तरे में पड़ जाएगा। पर इसके लिए भाजपा को ही दोषी नहीं ठहरा सकते। इसके लिए विपक्षी गठबंधन की अराजक स्थिति और नेतृत्व का भ्रम अधिक ज़िम्मेवार हैं। अगर वह ख़ुदकुशी करने को तैयार है, तो भाजपा क्यों रोकेगी?