इंडिया और भारत (India and Bharat)

39 वर्ष के रणवीर सिंह की मौत अपने घर मध्य प्रदेश में मुरैना के बड़फड़ा गाँव पहुँचने से 80 किलोमीटर पहले हो गई। देश भर में घोषित 21 दिन के लाँक डाउन के बाद दिल्ली से यह युवक रेल या बस सेवा बंद होने के कारण पैदल ही 326 किलोमीटर दूर अपने गाँव के लिए निकल पड़ा था लेकिन आगरा के नज़दीक भूखे प्यासे रणवीर की सड़क के किनारे हार्ट अटैक से मौत हो गई। पिछले कुछ दिनों में ऐसे बहुत से दुखद क़िस्से सामने आए है। बहुत प्रवासी महिलाओं तथा बिलखते बच्चों के साथ सर पर सामान उठाए भूखे प्यासे कई सौ किलोमीटर पैदल चलने के लिए मजबूर है।जब तक सरकारों को इस विशाल मानवीय त्रासदी का अहसास हुआ लाखों लोग दूसरे प्रदेशों में दाख़िल हो चुके थे और हो सकता है कि कुछ अपने साथ अभी तक अछूते देहात में संक्रमण भी ले गए हों। प्रदेशों की सीमाओं पर घोर अफ़रातफ़री और अराजकता के दृश्य देखने को मिले। इतनी बड़ी संख्या में पलायन देख कर सरकार के भी हाथ पैर फूल गए और कई सौ बस उपलब्ध करवाई गई लेकिन बाद में इसी सरकार ने सीमाएँ सील करने का आदेश दे दिया।

प्रवासियों के इस सामुहिक पलायन के लिए सरकार बिलकुल बेतैयार थी पर उनके सामूहिक पलायन ने सरकार के लाँक डाउन को कमज़ोर कर दिया। यह ग़रीब प्रवासी किसी की भी ज़िम्मेवारी नही हैं। लावारिस और लाचार हैं। हाँ चुनाव आते ही सब इन्हें अपनाना शुरू कर देंगे। उन्हें तो इतना अप्रिय समझा गया कि संक्रमण के डर से रास्ते के कई गाँवों ने उनके प्रवेश को रोकने के लिए पहरा लगा दिया। बेहतर होता कि वह जहाँ है वहाँ ही रहते लेकिन पलायन के सिवाय उनके पास कोई चारा नही था। भुखमरी और मुमकिन वायरस के बीच उन्होंने बीमारी का जोखिम उठाना बेहतर समझा। काम काज रुक गया था। रोज़गार नही रहा था। अधिकतर के मकान मालिकों ने किराया न मिलने की सूरत में घोर असंवेदना दिखाते हुए निकाल दिया था। इसलिए बड़े शहरों को अलविदा कह वह उस जगह के लिए निकल पड़े जहाँ वह बेगाने नही होंगे, जहाँ उन्हें अपनापन मिलेगा और छत मिलेगी चाहे वह फूस की बनी क्यों न हो।अर्थात उनके गाँव।

यह समाज की सबसे निचली कड़ी है। इनकी असुरक्षित मानसिकता समझने की ज़रूरत है। बड़े शहर उनके लिए कमाई की जगह है जिससे वह गाँव में रह रहे अपने परिवार का पोषण करते है। शहर के साथ उनका कोई लगाव नही है इसलिए विपदा की घड़ी में ‘घर’ के लिए निकल पड़े चाहे वह कई सौ किलोमीटर दूर है। सरकार के प्रति भी उनका भारी अविश्वास है जो उनकी परवाह नही करतीं और उनके ख़िलाफ़ हिंसा से परहेज़ नही करती। उन पर डंडे बरसाए गए और उन्हें मुर्ग़ा बनाया गया और उन्हें अपमानित किया गया। बरेली में सड़क पर बैठा कर पुरूष महिलाओं और बच्चों पर कैमिकल की वर्षा की गई। क्या वह कोई कीट है जो उन पर कीटनाशक बरसाई गई ? यह सरकारी घमण्ड और क्रूरता देश की बड़ी समस्या है।

articleimageभारत सरकार ने इस वायरस से निबटने के लिए प्रशंसनीय सही क़दम उठाए है इसीलिए हमारी वह दुर्गति नही हुई जो कई विकसित देशों की हो रही है। हज़ारों को विदेश से लाया गया। उन्हें कवारनटीन कियागया। वरिष्ठ मंत्री लगातार विशेषज्ञों से सम्पर्क में है।लाँक डाउन भी सही समय किया गया। अगर पहले किया जाता तो आर्थिक नुक़सान होता और अगर बाद मे किया जाता तो वायरस फैल जाता। लेकिन इस सारे व्यापक प्रबन्धन में यह गफ़लत हो गई कि यह सही आंकलन नही क्या गया कि रोज़गार ठप्प होने पर असंगठित क्षेत्र में क्या होगा? सरकार को यह आभास नही था कि बहुत बड़े वर्ग के लिए पेट भरने की समस्या खड़ी हो जाएगी और वह बेपरवाह हो जाएँगे और बड़े शहर छोड़ भाग निकलेंगे।अब सीमाएँ सील की जा रही है पर मुहावरे के अनुसार, घोड़ा भागने के बाद असतबल को ताला लगाया जा रहा है।

नोटबंदी के भी ऐसा ही हुआ था। तब भी सही आंकलन नही किया गया था कि निचली कड़ी को क़दम से कितनी तकलीफ़ होगी।लाँक डाउन लोगों को बचाने के लिए बिलकुल ज़रूरी था पर इन दोनों मामलों में सबसे निचली पायदान का पर्याप्त ध्यान नही रखा गया इसीलिए पलायन के सैलाब की तस्वीरें देखने को मिल रही हैं।

2019 के आर्थिक सर्वेक्षण के अनुसार देश की कुल श्रमिक संख्या का 93 प्रतिशत असंगठित क्षेत्र में है। अर्थ व्यवस्था का पहिया चलते रखने में इनका बड़ा योगदान है। इनके बिना न कारख़ाना चल सकता है न खेत में काम हो सकता है। पंजाब सरकार चिन्तित है कि कटाई का समय आ रहा है और अगर प्रवासी लेबर निकल गई तो क्या होगा। पर विपदा के समय इनकी देखभाल का कोई गम्भीरता से प्रयास नही करता जबकि कमज़ोर की रक्षा करना सरकार का पहला धर्म होना चाहिए। अफ़सोस यह भी है कि हमारा समाज भी दबे कुचलों की खुल कर मदद नही करता। केवल सिख समुदाय है जो ‘शुभ करमन ते कबहूं न टरों ‘ को वचन पर चलते हुए विपदा के समय देश विदेश में जोश के साथ लंगर लगाते है और गुरुद्वारों में बेसहारो को पनाह देते है पर बाक़ी धार्मिक संस्थाऐं मदद के लिए हाथ उठाने को तैयार नही। विशेष तौर पर हम हिन्दुओं में अपने अभागे भाईयों की मदद करने का जज़्बा बहुत कम है।

किसी ने सही लिखा है कि हिन्दोस्तान में दो दो हिन्दोस्तान नज़र आते है। यह अंतर सदियों से चला आ रहा है अफ़सोस कि समय के साथ यह कम नही हो रहा। आज भी ‘हम’ और ‘वह’ हो रहा है। एक इंडिया है जो माडर्न है दुनिया की बराबरी करता है तो एक भारत है जो प्राचीन है और शताब्दियों पीछे है। दोनों का कोई मेल नही है। इंडिया समझता है कि इस विपदा में उसे भारत से ख़तरा है लेकिन मेरा तो पूछना है कि देश को इस वक़्त ख़तरा इन ग़रीबों से है या उनसे है जिनका सम्पर्क विदेशों से है? आख़िर बाहर से यह वायरस लाया कौन? यह वायरस या विदेशों में पढ़ रहे छात्र लाए या विदेश गए बिसनेस मैन लाए या एनआरआई लाए या विदेशों में गए भारतीय टूरिसट लाए। इनके सम्पर्क में जो आया वह फँसता गया। पंजाब तो फँसा ही अपने एनआरआई के कारण जो यहाँ आ कर ग़ायब हो गए। एक सज्जन जो विदेश से आए थे की मौत हो गई पर वह इतने लोगों को संक्रमित कर गए कि नवांशहर में एक दर्जन गाँव लाँक डाउन में हैं।विदेश से आई सिंगर कनिका कपूर कि मिसाल है जिसके कारण कई लोगों को बंद होना पड़ा। कई विदेशों से आ कर बेपरवाह बाज़ारों डेरों और दूसरे धर्म संस्थानों में घूमते रहे। परिवार के सदस्यों से मिलते रहे। शादी और दूसरे समाजिक कार्यक्रम में हिस्सा लेते रहे। इन लोगों ने सब को ख़तरे में डाला है,आपके घर में काम करने वाली ने ही। दिलली में निज़ामुद्दीन मरकज़ जहाँ हज़ारों लोग मौजूद थे के कारण 7 मौतें हो चुकी है और कई सौ संक्रमित है। ऐसी जानलेवा लापरवाही के लिए ग़रीब ज़िम्मेवार नही है। मज़हब के ठेकेदार भी कब बाज़ आएँगे ?

विदेश से बीमारी अमीर लाए है लेकिन अगर यह फैलती है तो भुगतान ग़रीब करेंगे। यह समाचार भी है कि फ़्लाइट बंद होने के बाद कई रईसों ने विशेष चार्टर जेट से अपने बच्चे योरूप से यहाँ मँगवाए है। ऐसे सौ प्राईवेट जैट आए है जिन पर 90 लाख रूपया प्रति उड़ान ख़र्च हुआ है। सरकार ने भी विदेशों में फँसे लोगों को लाने के लिए विमान भेजेपर दुख है कि जो उदारता विदेशों में फँसे भारतीयों के प्रति दिखाई गई वह देश के अन्दर प्रवासियों के प्रति नही दिखाई गई।हम ग़रीबों की बात बहुत करते है पर व्यवस्था का ग़रीबों के प्रति आज भी बे दर्द और तिरस्कार का रवैया है। बरेली की घटना मिसाल है। अपने से कम भाग्यशाली लोगों के प्रति हमारे एक वर्ग में भी अगर नफ़रत का नही तो कम से कम असहयोग का रवैया है।

शहरी भारत का बड़ा भाग गंदी बस्तियों में रहता है जहाँ जिसे सोशल डिसटैंसिंग कहा जाता है हो ही नही सकती। लेकिन हम उन्हें अपने हाल पर नही छोड़ सकते। अगर यह वायरसगाँव या बस्तियों में फैल गया तो शहर सुरक्षित नही रह सकेंगे। डूबेगी किश्ती तो डूबेंगे सारे ! चीन से उत्पन्न इस कमबख़्त वायरससे उभरी हालत का साफ़ संदेश है कि असंगठित क्षेत्र की हिफाज़त की पूरी ज़िम्मेवारी सरकारों को उठानी होगी। इसे संगठित करने की ज़रूरत है। भारत को सम्भाले बिना इंडिया महफूज़ नही रह सकता। सही दिशा देने का बीड़ा मोदीजी,जिन्होंने इस संकट में बढ़िया नेतृत्व दिया है, को उठाना है ताकि भविष्य में किसी रणवीर सिँह को इस तरह ज़िन्दगी की रण हारनी न पड़े।

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Chander Mohan is the grandson of the legendary editor of Pratap, Mahashya Krishan. He is the son of the famous freedom fighter and editor, Virendra. He is the Chief Editor of ‘Vir Pratap’ which is the oldest hindi newspaper of north west india. His editorial inputs on national, international, regional and local issues are widely read.