यह पार्ट-टाईम सियासत का टाईम नहीं है, No Time For Part Time Politics

बिहार में एनडीए की महा जीत और महागठबंधन की महा हार ने देश की राजनीति को बदल दिया है। पिछले लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के बेहतर प्रदर्शन के बाद राहुल गांधी विपक्षी नेता बनने में सफल रहे थे। उसके बाद समझा गया कि विपक्ष के इंडिया गठबंधन में जान पड़ जाएगी। पर पहले महाराष्ट्र, फिर हरियाणा, फिर दिल्ली के बाद अब बिहार के चुनाव बता गए हैं कि भाजपा और एनडीए अपनी स्थिति मज़बूत करने में सफल रहें हैं जबकि कांग्रेस ऐसी जगह पहंच गई है कि उसकी प्रासंगिकता पर ही सवाल उठने लगे हैं। प्रधानमंत्री मोदी ने तो भविष्यवाणी भी कर दी है कि आगे चल कर कांग्रेस का एक और विभाजन हो सकता है। बिहार में एनडीए को मिली 202 सीटें और महागठबंधन को मिली 35 सीटें सारी कहानी बयान कर रहीं है। कांग्रेस को केवल 6 सीटें मिली जो 2010 के बाद का उनका सबसे ख़राब प्रदर्शन है। कांग्रेस की कमजोरी राजद को भी ले बैठी जैसे पिछले चुनाव में भी हुआ था।

तमिलनाडु के मुख्यमंत्री स्टैलिन के अनुसार “स्पष्टता,ज़मीन पर काम और कल्याणकारी योजनाएँ” चुनाव जीतती हैं। बिहार में हमने एनडीए के अभियान मे यह सब देख लिया। प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में स्पष्ट और तीखा अभियान चलाया गया। लोगों को बार बार ‘जंगल राज’ याद करवाया गया। हिन्दुत्व के मुद्दे को एक तरफ़ रख बिजली,पानी,सड़क,रोज़गार पर ज़ोर दिया गया। धर्म नहीं विकास का मुद्दा उठाया गया। यह समझ लिया कि नीतीश कुमार की ‘पलटू कुमार’ की छवि के बावजूद लोकप्रियता क़ायम है इसलिए ‘नरेन्द्र-नीतीश’ के नाम पर वोट माँगे गए। मोदी-अमित शाह की जोड़ी ने भी ज़बरदस्त अभियान चलाया। यह जोड़ी जब मैदान नें उतरती है तो सब कुछ दांव पर लगा देती है। प्रधानमंत्री मोदी ने 20 रैली की थी। जिन 77 सीटों पर उन्होंने प्रचार किया था वहाँ 97% स्ट्राइक रेट रहा है। राहुल गांधी ने 13 सभाऐं की थी। स्ट्राइक रेट 10% रहा। नीतीश कुमार फिर मुख्यमंत्री बन गए हैं पर चुनौतियाँ कम नहीं है। देश में बिहार सबसे नीचें है। पलायन रोकने के लिए उद्योग चाहिए पर अभी उद्योग बिहार में लौटने का अनिच्छुक है। नई सोच चाहिए जो नीतीश कुमार के बस की बात नहीं है।

 बिहार में महिला वोटर ने पुरूष वोटर से लगभग 9% अधिक वोट डाला है। पोलिंग बूथों पर महिलाओं की लम्बी लाइनें ही बता गईं थी कि इस बार महिला वोटर निर्णायक होगा। एनडीए को जो भारी जीत मिली है इसमें महिला वोटर का बड़ा हाथ है। नीतीश कुमार बहुत समय से महिला वोटर को सफलतापूर्वक प्रभावित करते आ रहें हैं। पर जिस योजना के कारण महिलाओं का ज़ोर शोर से समर्थन प्राप्त हुआ वह था 1.21 करोड़ महिलाओं के खातों में 10000 रूपए का ट्रांसफ़र। इससे बाज़ी बिल्कुल एनडीए के पक्ष में पलट गई। यह योजना विवाद का विषय भी है क्योंकि चुनाव से पहले इसे शुरू किया गया और चुनाव के दौरान भी खातों में  पैसा आता गया। विपक्ष इसे ‘चुनावी घूस’ कहता है, जो शायद यह है भी। चुनाव आयोग ने भी इसे नियंत्रण करने का कोई प्रयास नहीं किया। अगर इसी तरह चुनाव से पहले क़ानूनी ढंग से पैसा बंटता गया तो लोकतंत्र और चुनावी प्रक्रिया खोखली हो जाएगी। कोई अंत नहीं होगा।  

ऐसी ‘घूस’ सब सरकारें दे रही है। रोटी, कपड़ा और मकान के साथ पैसा भी जुड़ गया है। बिहार में उसके प्रभाव को देखते हुए आगे चुनाव के समय सब सत्तारूढ़ सरकारें यह फ़ार्मूला अपनाएँगी जो प्रदेशों की अर्थव्यवस्था के लिए अच्छा नही है। मनी-पावर का खुला इस्तेमाल किया जाएगा। केन्द्र के पास तो और भी अधिक पैसा है।अफ़सोस है कि ‘रेवड़ी’ के खिलाफ विचार व्यक्त करने के बाद प्रधानमंत्री मोदी ने ऐसी कथित कल्याणकारी योजनाओं को अपना लिया है। इसमें विपक्ष सत्तापक्ष का मुक़ाबला नहीं कर सकता। बराबर का खेल मैदान नहीं रहेगा जो लोकतंत्र की पहली शर्त है। तेजस्वी यादव ने भी हर परिवार को एक नौकरी देने का वादा किया था पर लोग प्रभावित नहीं हुए। कारण स्पष्ट है। विपक्ष भविष्य में देने का वादा कर रहा था जबकि सत्तापक्ष ने ठीक चुनाव के समय खातों में 10000 रूपए डालना शुरू कर दिया। और चुनाव आयोग ने आँखें मूँद लीं।

लेकिन चुनाव में एनडीए की जीत का यह ही कारण नहीं है। और बड़ा कारण है कि विपक्ष में लोगों का विश्वास नहीं रहा। असली बात तो कांग्रेस के लगातार पतन की है। जहां भाजपा में जीत की भूख है वहाँ कांग्रेस में जीत के लिए तड़प ग़ायब लगती है। राहुल गांधी के नेता बनने के बाद पार्टी 24 चुनाव हार चुकी है। 2024 के बाद हुए 9 चुनावों में से कांग्रेस केवल दो जीत सकी है और वह भी जम्मू कश्मीर और झारखंड में सहयोगियों के साथ मिल कर।  हर हार के बाद अंग्रेज़ी के शब्द ‘इंट्रोस्पैकशन’ अर्थात् मंथन का इस्तेमाल किया जाता है। पर कितना इंट्रोस्पैकशन करना है? जो पिछले हुए थे उनसे क्या परिवर्तन आया? जिस पार्टी ने देश को आज़ादी दिलवाई थी वह अब परिवार के तीन सदस्यों के इर्द-गिर्द जम गई है। वहां भी एक व्यक्ति, राहुल गांधी ही सब फ़ैसले ले रहें हैं और बार बार प्रदर्शित भी कर रहें हैं कि पार्टी की नैया पार लगाने की क्षमता उनमें नहीं है, और शायद दिलचस्पी भी नहीं है।  

एक अख़बार की खबर के अनुसार चुनाव परिणाम के बाद राहुल गांधी मस्कट का अपना दौरा बीच छोड़ लौट आए और चुनाव प्रबंधकों पर अपना ग़ुस्सा निकाला। बिहार प्रभारी कृष्णा अल्लावारू और वेणुगोपाल निशाने पर थे। यह खबर ही बताती है कि कांग्रेस की दुर्गति का कारण क्या है। कांग्रेस को एक पार्ट टाइम नेता चला रहा हैं जो निर्णायक समय में ग़ायब हो जाता हैं। जब दिल करता है वह विदेश भाग जाते है। यह नही है कि वह अपनी निजी ज़िंदगी के हक़दार नहीं हैं, पर यह भारत की राजनीति है जहां मुक़ाबला मोदी-शाह की जोड़ी से है जो 24*7 काम करती है। चुनाव अभियान के ठीक दौरान वह मध्यप्रदेश की पंचमढ़ी में जंगल सफ़ारी के लिए चले गए। बिहार चुनाव की तैयारी करने की जगह वह पिछले महीने दो सप्ताह दक्षिण अमेरिका की यात्रा पर निकल गए। वहाँ कोलम्बिया में उन्होंने भारत की राजनीति पर नकारात्मक टिप्पणी भी कर दी।

आम भारतीय तो जानता भी नहीं है कि कोलम्बिया हैं कहाँ! राहुल गांधी की इस पलायन की प्रवृत्ति का परिणाम है कि पार्टी दिशाहीन बन गई है। उनकी अनुपस्थिति में कोई निर्णय लेने वाला नहीं है। मल्लिकार्जुन खरगे भले आदमी हैं पर निर्णय राहुल के हाथ में हैं। अब तो प्रियंका गांधी भी पीछे हट गईं लगती हैं। बिहार के परिणाम के लिए कृष्णा अल्लावरू और वेणुगोपाल को ज़िम्मेवार ठहराना तो फ़िज़ूल है। इन्हें बिहार के बारे क्या मालूम है? उन्हें यह ज़िम्मेवारी दी ही क्यों गई? जिस बिहार ने राजेन्द्र प्रसाद, जयप्रकाश नारायण और जगजीवन राम जैसे राष्ट्रीय नेता दिए थे वहाँ राहुल गांधी को कोई स्थानीय नेता नहीं मिले? और कोई राहुल गांधी को समझाने वाला नहीं कि जो मुद्दे वह उठा रहें हैं चाहे वह कितने भी सार्थक क्यों न हों, वह ज़मीन पर नहीं चल रहे? ‘वोट चोरी’ को लेकर उन्होंने बहुत लम्बा अभियान चलाया। जनता को सावधान करना जायज़ है। पर लोगों की दिलचस्पी स्थानीय मुद्दों में है। संवैधानिक मुद्दों में दिल्ली के बुद्धिजीवी ही दिलचस्पी रखतें हैं।

बिहार की जीत से एनडीए  राष्ट्रीय स्तर पर और मज़बूत होगी। बंगाल, तमिलनाडु, असम और केरल के चुनावों पर असर पड़ेगा। राहुल गांधी के नेतृत्व पर और इंडिया ब्लॉक के वजूद पर सवाल उठेंगे। नरेन्द्र मोदी के सामने राहुल गांधी फीके पड़ रहें हैं। अंतराष्ट्रीय विशेषज्ञ डॉ.माइक हैनरी का कहना है कि “वर्तमान समय में मोदी का कोई विकल्प नहीं दिखता”। शशि थरूर बार बार कह रहें हैं कि “वंशवादी राजनीति भारतीय लोकतंत्र के लिए ख़तरा है”। पार्टी नेतृत्व के डिसकनैक्ट के दुष्परिणाम हम पंजाब में भी देख रहें हैं। तरनतारन के उपचुनाव में कांग्रेस पार्टी चौथे नम्बर पर रही है और ज़मानत ज़ब्त हो गई। यह वह प्रदेश है जहां कभी कांग्रेस की सरकार थी। पर नवजोत सिंह सिद्धू को अमरेन्द्र सिंह के खिलाफ खुला छोड़ दिया गया।  सिद्धू तो अब रियलिटी शो में जज बन गए हैं पर पंजाब में आप जम गई है। लेकिन क्या कांग्रेस की दिल्ली में किसी को पंजाब के लिए फ़ुर्सत है?

बिहार की जीत में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व, भाजपा के कुशल प्रबंधन,नीतीश कुमार की बेदाग़ छवि और महिलाओं को 10000. रूपए की गिफ़्ट का बड़ा हाथ है। पर बराबर का नैरेटिव कांग्रेस की दयनीय स्थिति का है। संगठन का हाल एक ऐसी कठपुतली जैसा है जिसकी तार दिल्ली से झक्की और सनकी नेतृत्व मनमाने ढंग से खींचता रहता है। संगठनात्मक क्षय, समाजिक क्षेत्र का सिंकुडना, और राजनीतिक सोच का अभाव सब का कारण है कि नेतृत्व हक़ीक़त से कटा हुआ है। इसीलिए कांग्रेस और इंडिया गठबंधन के भविष्य पर सवाल खड़े हो रहें हैं। एक बार फिर कांग्रेस- मुक्त भारत की बात उठ रही है, जो बड़ी राष्ट्रीय त्रासदी होगी। पर इस चर्चा के लिए वह खुद के सिवाय किसी को दोषी नहीं ठहरा सकते। जैसे पाकिस्तानी शायर मुनीर नियाज़ी ने कहा है,

                कुज शहर दे लोक वी जालम सन

                कुज सानूँ मरन दा शौक वी सी

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Chander Mohan is the grandson of the legendary editor of Pratap, Mahashya Krishan. He is the son of the famous freedom fighter and editor, Virendra. He is the Chief Editor of ‘Vir Pratap’ which is the oldest hindi newspaper of north west india. His editorial inputs on national, international, regional and local issues are widely read.