‘बाम्बे’ मुम्बई बन गया, सिंगापुर या हांगकांग न बन सका, Mumbai And Its Contradictions

महाराष्ट्र के स्थानीय निकाय के चुनाव परिणाम बता गए हैं कि इस समय देश में भाजपा का कोई मुक़ाबला नहीं है। न वह नेतृत्व किसी के पास है और न ही वह संगठन, और न ही वह पैसा। 2024 के आम चुनाव में भाजपा  बहुमत के नीचे आ गई थी, उससे वह उभर चुकी है। एक के बाद एक वह महाराष्ट्र, हरियाणा और बिहार के विधानसभा चुनाव अच्छी तरह जीत गई थी। विपक्ष, विशेष तौर पर राहुल गांधी, ‘वोट चोरी’ की शिकायत करते रहे पर कोई सुनता नहीं। लोग समझतें हैं कि छोटी मोटी धांधली तो हो सकती है, पर इतने व्यापक स्तर पर नहीं कि वह चुनाव परिणाम ही उलट दे। महाराष्ट्र के चुनाव से पहले दक्षिण से एक चौंकने वाला परिणाम आया है। दूर केरल में तिरूवनंतपुर में भाजपा अपना मेयर और डिप्टी मेयर बनाने में सफल रही है। यह क्षेत्र कांग्रेस और वाम दलों की कर्मभूमि रही है। तिरूवनंतपुर से सांसद भी शशि थरूर है। पास वायनाड से प्रियंका गांधी सांसद हैं। केरल के स्थानीय चुनावों में भाजपा का प्रदर्शन संतोषजनक रहा। बताया जाता है कि वहाँ संघ की 5142 शाखाएँ है। इस वैचारिक मेहनत का परिणाम नज़र आने लगा है। विपक्ष को सावधान हो जाना चाहिए क्योंकि आगे केरल समेत तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल, असम के चुनाव है।

 महाराष्ट्र के चुनाव परिणामों की गूंज दूर तक सुनी जाएगी। महाराष्ट्र के 29 में से 25 नगर निगम में भाजपा सबसे बड़ी पार्टी है। भाजपा को 1400 सीटें मिलीं है तो कांग्रेस को 324। यह फ़ासला कांग्रेस कैसे पार करेगी?एक साल पहले महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को भारी झटका मिला था। यह प्रदेश दशकों कांग्रेस का गढ़ रहा और देश का सबसे समृद्ध प्रांत है। 140 साल पहले मुम्बई में कांग्रेस का जन्म हुआ था। यहाँ ही यह कमजोर पड़ गई है। मुम्बई की महानगरी का 74000 करोड़ रूपए का बजट हिमाचल प्रदेश और गोवा से अधिक है। मुम्बई की शक्ल भी बदल गई है। यह ‘मराठी मानुस’ का ही शहर नहीं रहा जिस पर कभी बाला साहब ठाकरे का कठोर शासन रहा है। अब यह सबका शहर बनता जारहा है इसीलिए इस बार ‘मराठी अस्मिता’ का कार्ड भी नहीं चला।  भाजपा को गुजराती, उत्तर प्रदेश और बिहार के लोगों का समर्थन अधिक मिला है। राज ठाकरे द्वारा फिर ग़ैर-मराठियों को गाली देने के कारण उद्धव ठाकरे को भी नुक़सान पहुँचा है।

लेकिन बीएमसी के चुनाव परिणाम भी बता गए हैं कि (1)भाजपा अपने बल पर मेयर नही बना सकी और उसे शिवसेना शिंदे को साथ लेना पड़ेगा। या और तोड़फोड़ करनी पड़ेगी। 227 सीटों वाली बीएमसी में भाजपा को 89 सीट ही मिली है। अर्थात् बहुमत से बहुत नीचे है। (2) अगर उद्धव ठाकरे की शिवसेना और कांग्रेस के बीच गठबंधन हो जाता तो शायद परिणाम अलग होते। उद्धव  ठाकरे की पार्टी को 65 सीटें मिली और वह दूसरे नम्बर पर रही है। केन्द्रीय मुम्बई में उनका प्रभाव अभी क़ायम है। पर कांग्रेस को तो केवल 24 सीटें ही मिली पर फिर भी वह ‘अपनी शर्तों पर’ गठबंधन के लिए ज़िद करते हैं जैसे अब तमिलनाडु में द्रुमुक के साथ किया रहा है। वह समझ नहीं रहे कि नीचे से ज़मीन खिसक रही है। बीएमसी के चुनाव में भाजपा का स्ट्राइक रेट 66% रहा है, उद्धव ठाकरे की पार्टी का 39%, जबकि कांग्रेस का 16% ।किस ग़लतफ़हमी में हैं यह सज्जन ? शरद पवार को भी बहुत धक्का पहुँचा है। महा विकास अघाड़ी का भविष्य खतरें में है। पवार जैसे पुराने पावर ब्रोकरेज का समय निकल गया है। नई सोच, नई नीति और नए चेहरे की तरफ़ लोग आकर्षित हो रहें हैं। भाजपा का नेतृत्व तो फ़ास्ट ट्रैक पर है पर विपक्ष पुरानी घिसी पिटी राजनीति के चक्कर में फँसा हुआ है।

यह भी दिलचस्प है कि सत्तारूढ़ महायुति गठबंधन के एक घटक, शिवसेना शिंदे, ने अपने 29 विजयी पार्षदों को बांद्रा के फ़ाइव स्टार ताज लैंडस एंड होटल में बुला लिया है। कहा तो जा रहा है कि उनकी ट्रेनिंग होगी पर घबराहट लगती है कि कहीं भेड़ें खिसक न जाए! यह हमारी राजनीति का बहुत घिनौना चित्र पेश करती है कि बार बार जन प्रतिनिधियों को होटलों या रिजोर्ट में बंद करना पड़ता है। है।घबराहट रहती है कि कहीं उनका कोई शिकार न कर जाए। आजकल राजनीतिक वफ़ादारी बहुत लचीली हो चुकी है। भाजपा को घबराहट नहीं क्योंकि उनके पास सता भी है, पैसा भी है और डराने धमकाने के लिए केन्द्रीय एजंसियां भी हैं। यह भी नज़र आने लगा है कि भाजपा धीरे धीरे सहयोगियों को ही ख़त्म कर रही है। पहले यह बिहार में देखा गया और अब महाराष्ट्र में देखा जा रहा है जहां एक उपमुख्यमंत्री अजीत पवार हाशिए पर चले गएं हैं तो दूसरे उप-मुख्यमंत्री सुशील कुमार शिंदे को अपने विजयी पार्षदों को होटल में बंद करना पड रहा है। मुख्यमंत्री दवेन्द्र फडणवीस की बल्ले बल्ले हैं। उन्हें अभी से 2029 में भाजपा के प्रधानमंत्री पद के सम्भावित उम्मीदवार की चर्चा शुरू हो गई है। अगली पीढ़ी से हैं। महाराष्ट्र जैसे साधन सम्पन्न प्रदेश के मालिक है। अब मुम्बई पर भी उनका क़ब्ज़ा हो गया है। पर इसी में उनके लिए ख़तरा भी लिखा हुआ है। कई लोग उन्हें ठोकर मारने के लिए तैयार होंगे।

मुम्बई की राजनीति उसका केवल एक पक्ष है। असली बात तो यह है कि हमारे सबसे धधकते शहर की हालत कब सुधरेगी? केन्द्र का ध्यान अहमदाबाद पर अधिक लगता है। वर्तमान चुनावों से पहले महाराष्ट्र के प्रमुख नगर निगमों, जिन में मुम्बई भी शामिल है, में चुनाव फ़रवरी 2017 में हुए थे। देश का सबसे समृद्ध शहर इतने सालों से जन प्रतिनिधि के बिना चल रहा है। इस बीच मुम्बई का पतन होता रहा। किसी ने सही कहा है कि मुम्बई का बजट 74000 करोड़ रूपए का है, पर यहाँ सड़कों पर 74000 गड्डे भी हैं! इसकी जनसंख्या 1.25 करोड़ है। यह देश का सबसे महँगा शहरी भूगोल है! एक हिस्सा तो बहुत चमकता है जिस में बड़े बड़े उद्योगपति, बिसनेस मैन और विमेन, बालीवुड के फ़िल्म स्टार, क्रिकेट के खिलाड़ी और दूसरे रईस रहतें हैं जिनकी तस्वीरें हम सोशल मीडिया में देखते रहतें हैं।  पैसे का खुला अश्लील प्रदर्शन होता हैं। देश का सबसे महँगा घर, मुकेश अंबानी का 27 मंज़िला ‘एंटिलिया’ मुम्बई में है। पर एशिया का सबसे बड़ा स्लम धारावी भी मुम्बई में ही है।

धारावी सिर्फ़ 2.3 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैला हुआ है। इस छोटे से क्षेत्र में 10 लाख लोग रहते हैं जहां न पीने के पानी का उचित प्रबंध है, न पर्याप्त शौचालय ही है। अधिकतर लोग ऐसी कोठरियों में रहने को मजबूर है जहां न रोशनी है न हवा है। पर मजबूरी है। जो बाहर से रोज़गार की तलाश में मुम्बई आता है उसे पैर रखने की जगह भी तलाशनी पड़ती है। पर धारावी मे धंधा भी चलता है और अनुमान है कि यहाँ का उद्यमशील छोटा उद्योग वार्षिक 1अरब डालर का सामान तैयार करता है। इसे ‘मिनी इंडिया’ भी कहा जाता है जो हर तरह की समस्या के बावजूद आगे बढ रहा है। पर ऐसे स्लम देश पर कलंक हैं। यह बड़ा दुर्भाग्य है कि दुनिया की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था के सबसे समृद्ध शहर में लाखों लोग पशुओं की तरह रहने पर मजबूर है। हर बरसात में शहर डूब जाता है। ट्रेन सर्विस जो लाइफ़लाइन है ठप्प हो जाती है। अब तो दिल्ली स्टाइल प्रदूषण की शिकायत हो रही है।

 किसी भी शहर से ज़्यादा मुम्बई का देश के प्रति योगदान है। इसने देश को सबसे अधिक राजस्व दिया है। किसी भी शहर ने इतना आतंकी प्रहार बर्दाश्त नहीं किया जितना मुम्बई ने किया है। पर महानगर  किसी भी शहर ने अपने दरवाज़े मज़लूमो के लिए इस प्रकार नहीं खोल कर रखे जैसे मुम्बई ने खोल रखें है। हम तो इसे सिंगापुर, हांगकांग और दुबई के बराबर का शहर बनाना चाहते थे। धन के मामले में शहर बराबरी कर रहा है पर नागरिक सुविधा तो तीसरी दुनिया की है। क्या यह चुनाव परिणाम कुछ बदलेंगे? आख़िर अब ट्रिपल इंजन सरकार होगी। पर सम्भावना बहुत कम है। समस्या इतनी विशाल है कि इलाज नज़र नहीं आता। इस ‘सपनो के शहर’ में लोग रोज़गार के लिए धड़धड़ा आ रहें हैं। पर जगह कहाँ है? इसीलिए तो धारावी जैसी काल कोठरियों में रहना पडता है।  चुनाव अभियान के दौरान जिन मुद्दों को उछाला गया उनमें वह बिलकुल ग़ायब थे जो लोगों की रोज़मर्रा ज़िन्दगी से जुड़े हैं। अधिक ज़ोर रेवड़ियाँ देने पर लगा रहा जिनसे अस्थाई राहत ही मिलती है। किफ़ायती आवास का वादा कर ज़ोहरान ममदानी न्यूयार्क के मेयर बन गए। ऐसा कोई वादा किसी ने मुम्बई के बारे नही किया क्योंकि सब जानते हैं कि यह पूरा नहीं हो सकता। यहाँ के मेयर के पास तो पूरी शक्तियाँ भी नहीं है।

 जॉनी वॉकर मुहम्मद रफ़ी की आवाज़ में गाते रहे, “यह है बाम्बे मेरी जान”। समय के साथ इसका नाम बदल कर मुम्बई रख दिया गया पर शहर का विरोधाभास कम होने की जगह बढ़ता गया। बहुत लोगों के लिए जीना यहाँ अभी भी मुश्किल है। विवादास्पद लेखक ग्रैगरी डेविड राबर्टस ने मुम्बई के बारे लिखा है, “भारत के किसी भी और शहर की तुलना में मुम्बई में सबसे अधिक सपने साकार होतें है, और सबसे अधिक सपने बुझा दिए जातें हैं”। मुम्बई के इस विरोधाभास को एक चुनाव समाप्त नहीं कर सकता।

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Chander Mohan is the grandson of the legendary editor of Pratap, Mahashya Krishan. He is the son of the famous freedom fighter and editor, Virendra. He is the Chief Editor of ‘Vir Pratap’ which is the oldest hindi newspaper of north west india. His editorial inputs on national, international, regional and local issues are widely read.