22 अप्रैल, 2025. कश्मीर में पहलगाम के नज़दीक पर्यटन स्थल बैसरन में तीन सशस्त्र आतंकवादियों ने वहाँ लोगों का धर्म पूछा और अत्यन्त क्रूरता से 26 लोगों की हत्या कर दी। हमारी ज़मीन पर पहले भी हमले हुए है पर ऐसा जघन्य हमला पहले नहीं हुआ जब परिवार के सामने हिन्दू मर्दों को अलग कर गोली मार दी गई।सारा देश तड़प उठा। तब ही स्पष्ट हो गया था कि इसका बदला लिया जाएगा। 7 मई 2025 की सुबह 1.05 बजे भारत ने पाकिस्तान स्थित आतंकी कैम्पों पर हमला कर 22 अप्रैल का बदला लेने की प्रक्रिया शुरू कर दी जिसे इतिहास में ‘आपरेशन सिंदूर’ के नाम से जाना जाएगा। नौ आतंकी ठिकानों को निशाना बनाया गया। कुछ ही घंटों के बाद पाकिस्तान ने जवाबी कार्रवाई शुरू कर दी। चार दिन चले इस संक्षिप्त, पर भीषण, युद्ध ने इस क्षेत्र में युद्ध की रूपरेखा बदल दी। पाकिस्तान को स्पष्ट संदेश भेज दिया गया कि आतंकी हमला अदंडित नहीं जाएगा। अगर आतंक आपकी रणनीति का हिस्सा है तो इसका ज़बरदस्त जवाब देना हमारी रणनीति का है।
भारत ने राष्ट्रीय शोक को राष्ट्रीय संकल्प में बदल कर जो कार्यवाही की उसी का परिणाम था कि 10 मई 2025 को दोपहर 3.35 मिनट पर पाकिस्तान के डीजीएमओ का हॉटलाइन पर हमारे डीजीएमओ को फ़ोन आया कि पाकिस्तान तत्काल युद्ध विराम चाहता है। दो घंटे के बाद दोनों ने युद्ध विराम का आदेश दे दिया पर पहले पाकिस्तान के डीजीएमओ को बता दिया गया कि अगर आतंकी हमले होते रहे तो पाकिस्तान के लिए इसकी क़ीमत बढ़ती जाएगी, ‘जो किया जाएगा उसके परिणाम होंगे’।अमेरिका के राष्ट्रपति डानल्ड ट्रम्प बार बार युद्ध समाप्त करने का श्रेय ले रहें हैं, पर हक़ीक़त है कि युद्ध विराम पाकिस्तान के अनुरोध पर हुआ था। हमारे देश में भी कुछ लोग नाखुश हैं कि युद्ध विराम क्यों किया गया जबकि पाकिस्तान की सामरिक शक्ति हम नष्ट करने में सफल हो गए थे। मैं इस आलोचना से सहमत नहीं हूँ। हमारा मक़सद आतंक का जवाब देना था। यह मुरीदके और भावलपुर के आतंकी अड्डों को तबाह कर दे दिया गया। हमारा मक़सद उनकी ज़मीन हथियाना या सैनिक संस्थानों पर हमले करना नहीं था। यह हमें मजबूरन करना पड़ा।
पाकिस्तान ने 8 मई की रात को आदमपुर, श्रीनगर, जम्मू, उधमपुर पर हमले किए। आदमपुर विशेष तौर पर निशाने पर रहा। कई सौ ड्रोन भेजे गए। पाकिस्तान को होश ठिकाने तब आए जब हमने उनके अड्डों पर ताबड़तोड़ हमले किए और स्यालकोट, चकलाला, सरगोधा, रफीकी, रहीम यार ख़ान, मुरीद को निशाना बनाया। सबसे महत्वपूर्ण नूर खान एयरबेस की तबाही थी। यह इस्लामाबाद से केवल 10 किलोमीटर दूर है। बताया जाता है कि पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ़ को सुबह 2.30 बजे जगा कर इस हमले की विशेष सूचना दी गई। आपरेशन सिंदूर केवल 88 घंटे चला पर पाकिस्तान को बड़े सबक़ दे गया। पहली बार हमने पाकिस्तान के दिल, पंजाब, पर हमला किया। हमने लाहौर के पास मुरीदके में हाफ़िज़ मोहम्मद सईद के लश्करे तोयबा के मुख्यालय पर हमला कर उसे तबाह कर दिया। यहीं अजमल कसाब और उसके साथियों ने ट्रेनिंग ली थी। दूसरा बड़ा हमला भावलपुर में मसूद अज़हर के जैश -ए -मोहम्मद के मुख्यालय पर किया गया। यह जगह सीमा से 100 किलोमीटर दूर है। इसे तबाह कर संदेश दे दिया गया कि आपका कुछ भी सुरक्षित नही है। जैश ने हाल ही में एक पोस्ट में कहा है, “वह रात भी अजीब थी। उपर से आग बरस रही थी”।
इन चार दिनों ने इतिहास बदल दिया। पूर्व राजदूत सईद अकबरूद्दीन ने लिखा है “कई सालों से भारत को कहा गया कि हम शोक को संयम में परिवर्तित करें। पहलगाम के बाद हमने शोक को बदले में बदल दिया”।
इस देश नें पहले भी आतंकी हमले सहे है। सबसे बड़ा मुम्बई पर 26/11/2008 का हमला था जब पाकिस्तान से आए आतंकियों नें 166 लोगों को मार दिया। तब यह माँग उठी थी कि जवाब दिया जाए पर मनमोहन सिंह सरकार ने कूटनीति का रास्ता अपनाया। तत्कालीन राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार शिव शंकर मेनन ने अपनी किताब ‘चौयसेज़’ में इस निष्क्रियता का स्पष्टीकरण यह दिया है, “नवंबर 2008 में मुम्बई पर आतंकी हमले के बारे हमने जो फ़ैसला लिया वह उस समय की सरकार को जो राष्ट्रीय हित नज़र आया, के मुताबिक़ था”। जब संसद पर 13 दिसम्बर 2001 को हमला हुआ तो भी वाजपेयी सरकार ने जवाबी कार्यवाही की जगह कूटनीति का ही सहारा लिया। कई महीने ‘आपरेशन पराक्रम’ में सीमा पर सेना बैठा कर उसे वापिस बुला लिया गया। मेनन लिखतें , “व्यक्तित्व मायने रखतें।अगर और लोग शिखर पर होते तो शायद भारत की प्रतिक्रिया और होती। वास्तव में मुझे विश्वास है कि अगर भविष्य में भारत को ऐसा ही फ़ैसला करना पड़ा तो प्रतिक्रिया अलग होगी”।
उनके यह शब्द भविष्यसूचक थे। अलग परिस्थिति, अलग लोग और अलग प्रतिक्रिया। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में भारत ने 2025 में इतिहास बदल दिया। जो 2001 और 2008 में होना चाहिए था पर नहीं किया गया, वह कर दिया गया। भारत ने आतंक का बदला ले लिया। यह भी बता दिया कि आपकी परमाणु छतरी हमें नहीं रोकेगी और यह आपको आतंकवाद के लिए दंड से सुरक्षा नहीं देगी। चीफ़ ऑफ डिफ़ेंस स्टाफ़ जनरल अनिल चौहान ने एक भाषण में यह स्पष्ट कर दिया,”मेरी समझ है कि परमाणु हथियार रोकने के हथियार हैं, युद्ध लड़ने के नही। भारत ने स्पष्ट कर दिया कि वह परमाणु ब्लैकमेल के आगे नहीं झुकेगा”।
पिछली सरकारों ने पाक प्रेरित आतंक का जवाब डोजियर भेज कर दिया जिन्हें किसी ने नहीं पढा। हमारे संयम को हमारी कमज़ोरी और संकल्प की कमी समझा गया। हमारे पास तब भी सैनिक क्षमता थी पर राजनीतिक इच्छा शक्ति और संकल्प का अभाव था। एयर मार्शल अनिल चोपड़ा (रि) लिखतें हैं, “सैनिक क्षमता उतनी ही कारगर होती है जितनी उसके पीछे राजनीतिक निर्देश…प्रधानमंत्री मोदी ने आपरेशन सिंदूर पर पहले घंटे से आख़िरी तक बिना हिचकिचाहट और बिना शर्तों के छूट दे दी थी”। जब पाकिस्तान ने जवाबी कार्रवाई की कोशिश की तो हमारी सेना को राजनीतिक नेतृत्व से पूछने की ज़रूरत नहीं थी। पाकिस्तान को पूरी तरह से ठोक दिया गया।
पर यह युद्ध कई सबक़ भी सिखा गया है। बड़ा सबक़ पाकिस्तान और चीन की मिलीभगत का है। चीन ने खुद स्वीकार किया है कि पिछले साल के अभियान के दौरान उन्होंने पाकिस्तान को तकनीकी सहायता प्रदान की थी। पाकिस्तान ने न केवल चीन निर्मित जे-10सीई लड़ाकू विमानों का ही इस्तेमाल किया बल्कि उन्हें चीन सैटेलाइट से प्राप्त हमारी सैनिक तैयारी के बारे ख़ुफ़िया जानकारी भी देता रहा। चीन के सरकारी मीडिया ने पहली बार एक इंजिनीयर झांग हेंग का पाकिस्तान के बारे साक्षात्कार प्रसारित किया है कि, “यह हमारे बीच कंधे से कंधा मिला कर, दिन रात काम करने से बने गहरे जुड़ाव का प्रमाण है”। आपरेशन सिंदूर की वर्षगाँठ पर इस इंटरव्यू को प्रसारित करना खुद बड़ा संदेश है कि चीन समझता है कि पाकिस्तान को वह जो मदद दे रहा है उसे छिपाने की जरूरत नही है। आपरेशन सिंदूर के दौरान हम उनके सैनिक सिस्टम से भी लड़ रहे थे जिसे चीन ने लैस किया है और जिसे वह गाइड कर रहे थे। डिप्टी चीफ़ ऑफ आर्मी स्टाफ़ लै.जनरल राहुल आर सिंह ने स्पष्ट कहा है कि भारत की “एक सीमा थी पर विरोधी एक से अधिक थे”। सेना के उतरी कमान के पूर्व कमांडर लै. जनरल डीएस हुड्डा ने कहा है, “भारत के लिए संदेश साफ़ है। पाकिस्तान के साथ भावी टकराव के समय चीन के साथ उनके व्यापक सहयोग की चुनौती के लिए हमें तैयार रहना चाहिए”।
कूटनीति और प्रचार पर भी बहुत ध्यान देने की जरूपत है। युद्ध विराम की घोषणा नई दिल्ली या इस्लामाबाद की जगह वाशिंगटन में राष्ट्रपति डानल्ड ट्रम्प ने की थी। प्रभाव यह गया कि हम नहीं जीते बल्कि अमेरिका ने युद्ध विराम करवाया है। पाकिस्तान का प्रचार खुद शाहबाज़ शरीफ़ ने सम्भाला और वह ट्रम्प को क़ाबू करने में सफल रहे। युद्ध विराम की घोषणा नई दिल्ली में होनी चाहिए थी। अब दुनिया को इस युद्ध के बारे बहुत अस्पष्ट राय है। पाकिस्तान के 100 के क़रीब सैनिक और इतने ही आतंकी मारे गए। हमारा दावा है कि उनके 13 जहाज़ नष्ट किए गए। जो हवाई अड्डों को नुक़सान हुआ वह अलग है। हमारा क्या नुक़सान हुआ? जो हमला करता है उसका नुक़सान तो होता है, पर यह उल्लेखनीय है कि पाकिस्तान में जो नुक़सान हुआ उसकी तो सैटेलाइट तस्वीरें हम दिखाने में सफल रहे पर पाकिस्तान हमारे नुक़सान की एक भी तसवीर नहीं दिखा सका। एयर मार्शल ए के भारती का कहना है कि,”सवाल यह बनता है कि क्या हमने आतंकी ठिकानों को नष्ट करने का लक्ष्य पूरा किया? ज़बरदस्त जवाब है, हाँ। हमारे सारे पायलट सकुशल घर लौट आए”।
पिछले साल मई के इन चार दिनों में भारत ने नई इबारत लिख दी। पहले रोकने पर ज़ोर दिया जाता था, अब डायरैकट एक्शन पर। पर क्या आपरेशन सिंदूर के बाद आतंक रूक जाएगा? यहां किसी को यह आशा नहीं है। पाकिस्तान का टैरेर नेटवर्क अभी भी क़ायम है क्योंकि उसे व्यवस्था का समर्थन प्राप्त है। उनकी सेना के वजूद के लिए यह ज़रूरी है। आपरेशन सिंदूर बहुत बड़ी सैनिक सफलता थी पर यह अहसास है कि भविष्य में भी ऐसी चुनौती आ सकती है। हमें संक्षिप्त और लम्बे दोनों युद्ध के लिए तैयार रहना होगा जहां चीन और तुर्की उनके साथ होंगे।अमेरिका और रूस का रवैया अस्पष्ट होगा।