कोटा के ‘कोचिंग कारखानो’ से समाचार है कि नीट-यूजी की परीक्षा की दोबारा तैयारी करने के लिए देश भर से आकांक्षी वहाँ लौट रहें है। इस परीक्षा की आयोजक नीट ने पेपर लीक होने के बाद तीन मई को होने वाली परीक्षा रद्द कर दी थी। अब यह 21 जून को दोबारा रखी गई है। 22 लाख छात्र और छात्राऐं जो डॉक्टर बनने का सपना लेकर इस परीक्षा में बैठे थे, को दोबारा तैयारी करनी पड़ेगी। दोबारा कोटा या दूसरे कोचिंग सैंटरों में जाना पड़ेगा। पैसे खर्चने पड़ेंगे। रात रात जागना पड़ेगा। मनोवैज्ञानिक बोझ बढ़ेगा। लय भी टूट जाती है। टेंशन से उम्मीदवार और उनके परिवारों को दोबारा गुजरना पड़ेगा। इसलिए कि कुछ भ्रष्ट लोगों ने पेपर लीक कर दिया। “टेलीग्राम’ और ‘वॉटसअप’ के द्वारा इसे प्रसारित कर दिया गया। लाखों रूपए की डील की गई। लातूर के एक कोचिंग सैंटर के मालिक को पकड़ा गया है। सीबीआई ने अदालत को बताया है कि उसे परीक्षा से 10 दिन पहले पेपर मिल गया था। 10 दिन पहले ? सब कुछ इतना सुविधाजनक है?
अब कुछ गिरफ़्तारियों की गईं है पर इसका फ़ायदा क्या है? क्या स्टूडेंट्स के जो दिन, जो मेहनत, जो पैसा खर्च हो चुके है, वह लौटाए जा सकते है? जिस टैंशन से वह गुजरें हैं? बहुत परीक्षार्थी समाज के उस तबके से हैं जो बहुत समृद्ध नहीं है। उन पर क्या गुज़रेगी? दोबारा तैयारी के लिए साधन कहाँ से आऐंगे? कोचिंग सैंटर वालों की ज़रूर मौज लग गई होगी। यह भी हमारी विशिष्टता ही कही जाएगी कि यहाँ कोचिंग सैंटर का पूरा नेटवर्क है। कई सौ करोड़ रुपये का धंधा है। दुनिया में कहीं और ऐसा नहीं है।
नीट-यूजी देश की सबसे प्रतिष्ठित परीक्षाओं में से एक है। 22 लाख परीक्षा में बैठे थे जबकि केवल 129000 ही मैडिकल सीटें हैं। डाक्टर व्यवसाय का यहां बहुत आकर्षण है पर हर बच्चा डाक्टर नहीं बन सकता। सब यह जानते हैं इसलिए सर धड़ की बाज़ी लगा देते हैं। यह स्पर्धा कितना मानसिक तनाव पैदा करती है यह इस बात से पता चलता है कि परीक्षा रद्द होने के बाद हताशा में 4 छात्रों ने आत्महत्या कर ली है। इन्होंने आत्महत्या इसलिए नहीं की कि वह पेपर नहीं देना चाहते थे या सफल नहीं हुए, उन्होंने आत्महत्या इसलिए की क्योंकि पूरी तैयारी के बावजूद उनका पेपर रद्द हो गया। वह एक गले सड़े भ्रष्ट तंत्र से हार गए।
अफ़सोस की बात है कि हमारे देश में पेपर लीक होने या परीक्षा रद्द करने की यह एकमात्र मिसाल नहीं है। ऐसा बार बार हो रहा है। अरविंद केजरीवाल का आरोप है कि 2014 के बाद 93 पेपर लीक हुए हैं। यह आँकड़ा कितना सही है मै नही कह सकता, पर हर साल किसी न किसी बड़ी परीक्षा में धांधली का समाचार ज़रूर मिल जाता है। रेलवे, पुलिस भर्ती आदि की परीक्षा में गड़बड़ी की बहुत शिकायतें मिलती रहती है। कई प्रदेशों को अपनी परीक्षा रद्द करनी पड़ी है। दो साल पहले 2024 में यही नीट-यूजी की परीक्षा का प्रश्न पेपर लीक हो गया था। तब सुप्रीम कोर्ट ने पूरी परीक्षा रदद करने पर रोक लगा दी थी और 1000 से अधिक परीक्षार्थियों को दोबारा परीक्षा देनी पड़ी थी। उनका क़सूर क्या था? इतने विशाल देश में ऐसी परीक्षाएँ करवाना आसान काम नहीं है पर इसीलिए तो यह एजेंसी बनाई गई है।संसदीय समिति को बताया गया कि 2024 में एनटीए द्वारा आयोजित 14 में से 5 राष्ट्रीय परीक्षा में या तो पेपर लीक हुआ या कोई और अनियमितता पाई गई। एनटीए की तो विश्वसनीयता ही नहीं रही।
इतने बड़े स्केल पर परीक्षा करवाना निश्चित तौर पर चुनौती है। डिजिटल प्रसार के कारण शरारत को रोकना और भी कठिन हो गया है। पर नीट का गठन ही इसलिए किया गया था ताकि मैडिकल परीक्षार्थियों को तनाव और कई जगह होने वाले एंट्रेंस टैस्ट से बचाया जा सके। पर वह तो उन चिन्ताओं को भड़काने में सफल रहे हैं । 2024 में जो गड़बड़ हुई से कोई सबक़ नहीं सीखा गया। 2024 की पेपर लीक के बाद भाजपा सरकार ने इसरो के पूर्व चेयरमैन के राधाकृष्णन की अध्यक्षता में एक हाई लेवल विशेषज्ञों की कमेटी बनाई थी जिसका काम परीक्षा प्रणाली का अध्ययन करना और इसे सुरक्षित रखने के सुझाव देना था। पर दो साल के बाद भी कमेटी के सुझावों पर अमल नहीं किया गया। तब की तरह अब फिर मामला सीबीआई को सौंप दिया गया है जो रोज़ाना गिरफ़्तारियाँ कर रही है। अख़बारों की सुर्ख़ियों के लिए पूरा काम हो रहा है। पर अगर इससे ही सिस्टम सही होता तो दो साल के बाद धांधली न होती। क्या इसका इलाज विकेंद्रीकरण है जैसा यूजीसी के पूर्व चेयरमैन प्रो. वी एन राजाशेखर पिल्ले ने सुझाव दिया है ? उनका कहना है कि पूरी तरह से केंद्रीयकृत परीक्षा भारत जैसे विशाल और विविध देश के लिए सही नहीं है। उनके इस सुझाव पर गौर करने की ज़रूरत है। पर असली बात तो विश्वसनीयता की है। जब तक आंतरिक कमज़ोरियों को ख़त्म नहीं किया जाता कोई भी सिस्टम सही नहीं रहेगा।
क्या कोई इलाज है? के राधाकृष्णन कमेटी ने सिफ़ारिश की थी कि पैन और पेपर टेस्टिंग से हट कर कम्प्यूटर बेस्ड टेस्टिंग शुरू करनी चाहिए। अब बताया जा रहा है कि अगले साल से नीट भी कम्प्यूटराज़ड टेस्टिंग करेगी। यह सिस्टम कई पश्चिमी देशों में है। वहां तो कई जगह स्टूडेंट्स को आनलाइन पेपर भेज दिया जाता है और कोई उपर से निगरानी नहीं होती। पर चैटजीपीटी और एआई के जमाने में यह प्रणाली तो खुद ही चुनौती है। हमारा तंत्र जो खुद को नाकाबिल साबित कर चुका है, वह कैसे सम्भालेगा? क्या और सख़्ती की ज़रूरत है? बुलडोज़र जस्टिस चाहिए? चीन में नक़ल या पेपर लीक को देशद्रोह माना जाता है। 7 साल की जेल है। हमारे यहाँ 5-10 वर्ष की क़ैद का प्रावधान है पर यह तब होगा अगर जाँच कर रही एजेंसी पूरी तरह से केस तैयार करेगी और न्यायपालिका जल्द से जलद इन ‘कॉक्रोच’ को सजा देगी। 2024 के घोटाले के बाद सीबीआई ने 50 लोगों को गिरफ़्तार किया था जिनमें मास्टर माइंड ,सरकारी अधिकारी और उम्मीदवार शामिल हैं पर अभी तक दो साल के बाद भी जाँच पूरी नहीं हुई। किसी को अदालत द्वारा सजा नहीं दी गई। क्या इस बार भी यही होगा? इस वक़्त जो सक्रियता दिखाई जा रही है वह मामला ठंडा पड़ने पर शांत हो जाएगी? रात गई बात गई!
लेकिन यहाँ मामला केवल पेपर लीक का ही नही। हर नागरिक को अपने दैनिक जीवन में इस भ्रष्ट और असंवेदनशील तंत्र का सामना करना पड़ता है। हमारी सड़कें क्यों टूटी रहती है? अब तो गड़करी जी की हाईवे भी झटके देती है। बिहार में पुल क्यों टूटते रहते है? 4 मई को गंगा के उपर विक्रमशिला सेतु की 33 मीटर की स्लैब गिर गई। 2021-2024 के बीच 26 बड़े पुल गिर गए। क्या किसी इंजीनियर या ठेकेदार को सजा दी गई? सम्भावना नहीं के बराबर है। हमारा पानी दूषित है, जलवायु दूषित है।खान पान में मिलावट है। फलों को इंजेक्शन लगाए जातें हैं। हमारे सरकारी अस्पतालों की हालत इतनी दयनीय क्यों है,विशेष तौर पर देहात में। यही स्थिति स्कूल शिक्षा की है। कई प्रदेशों में सरकारी शिक्षा बेहतर करने की कोशिश हो रही है पर लाखों स्कूल जीर्ण हालत में है और पढ़े लिंखे अनपढ़ पैदा कर रहें हैं। क्या इसका कारण है कि हमारे शासक अपने बच्चे विदेशों में पढ़ते हैं और ज़रूरत पड़ने पर अपने इलाज के लिए वह विदेश जा सकतें हैं। उन्हें कोई चिन्ता नहीं है। क्या वह उनसे इलाज करवाने के लिए तैयार होंगे जो लीक हुए पेपर या चीटिंग के द्वारा डाक्टर बने है?
यह भी नहीं कि यहाँ सब परीक्षा में धांधली होती है। हर साल यूपीएससी की परीक्षा होती है। पूरी तरह से सही, बिना किसी गड़बड़ के। लोगों का इस परीक्षा पर पूरा भरोसा है जो नीट खो बैठी है जबकि दोनों सरकार द्वारा गठित स्वायत्त संस्थाएँ हैं। क्या इसका कारण है कि यूपीएससी के कामकाज में राजनीतिक दखल नहीं है और नीट में है? असली समस्या है कि जवाबदेही नहीं है। शिक्षा मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान का कहना है कि सरकार की नीति भ्रष्टाचार के खिलाफ शून्य बर्दाश्त की है। वह कहते हैं कि, “हम स्टूडेंटस के भविष्य से किसी प्रकार की खिलवाड़ की इजाज़त नहीं देंगे”। इसका मतलब क्या है? आपके अधीन संस्थाओं में लगातार स्टूडेंट्स के भविष्य से खिलवाड़ हो रहा है। पूरी शिक्षा प्रणाली पर लोगों का विश्वास डोल रहा है। क्या यह इसलिए है कि शिक्षा प्राथमिकता नही, चुनाव जीतना है? सारा ध्यान और ज़ोर चुनाव जीतने पर है,व्यवस्था को सही करने पर नही? अब तो लाल बहादुर शास्त्री को याद करना भी अजीब लगता है। दीवार पर फ़ोटो टांग कर हम आत्म संतुष्ट है।
इस बीच जालंधर से अच्छा समाचार है कि ई-रिक्शा चालक का बेटा मुकेश पंजाब बोर्ड की 10वीं की परीक्षा में ज़िले में प्रथम और राज्य में तीसरे स्थान पर रहा है। मुकेश जैसे प्रतिभाशाली नौजवान देश में भरे हुए है। उल्लेखनीय है कि मुकेश भी मैडिकल करना चाहता है। सोच कर घबराहट होती है कि जब इसका और उसके जैसों का सामना इस तंत्र और इस माफिया से होगा तो कैसी हताशा पैदा होगी? सोचने की बात है कि ज़िन्दगी की दहलीज़ पर बच्चों को क्या सबक़ सिखाया जा रहा है? कि करप्शन और हेराफेरी ही उपर उठने का रास्ता है?