मुख्य न्यायाधीश की बेरोज़गार नौजवानों के एक वर्ग के बारे टिप्पणी ने देश में खलबली मचा दी है। देश का कमजोर युवा वर्ग न्यायपालिका को आशा से देखता है पर यहाँ उन्हें ‘कॉकरोच’ और ‘पैरासाइट’ (परजीवी)कहा गया। इसके बाद जो हुआ वह अप्रत्याशित था। ऑनलाइन तूफ़ान सा खड़ा हो गया। अमेरिका मे बॉस्टन यूनिवर्सिटी में पढ़ रहे भारतीय युवक अभिजीत दीपके ने व्यंग्य में ‘कॉकरोच जनता पार्टी’(सीजेपी) बना दी। रातोंरात यह व्यंग्य न रह कर युवाओं का आन्दोलन बन गया और तुच्छ कॉकरोच विरोध का प्रतीक बन गया। इंस्टाग्राम पर 2 करोड़ से अधिक फ़ॉलोवर बन गए जो भाजपा और कांग्रेस दोनों के फ़ॉलोवर्स को मिला कर अधिक थे। एक दिन में 1600% की वृद्धि हुई। X पर यह 2 लाख से उपर चले गया। इसकी लोकप्रियता से हैरान सरकार ने X को इसे बंद करने पर मजबूर कर दिया।
इस नए आंदोलन से सरकार परेशान है तो सिविल सोसाइटी दंग है। राजनीतिक मुख्यधारा के प्रति असरदार अविश्वास और असंतोष प्रकट किया जा रहा है। इससे पहले अन्ना हज़ारे के नेतृत्व में ‘इंडिया एगेंस्ट करप्शन’ अभियान ने तत्कालीन मनमोहन सिंह सरकार की चूलें हिला दीं थीं। इसी ने आम आदमी पार्टी को जन्म दिया था। कई प्रमुख लोग उससे जुड़े थे जिन्हें अरविंद केजरीवाल ने बाद में एक एक कर बाहर निकाल दिया था। पर तब सब इकट्ठे थे और अन्ना हज़ारे में उनके पास एक बड़ा नाम था। सीजेपी के पास ऐसा कुछ नहीं है। केवल अपने लैपटॉप और कम्प्यूटर हैं जिन्हें आज के दिनों में शांत नहीं किया जा सकता। अभिजीत दीपके को भी आशा नहीं होगी कि इतना विशाल समर्थन मिलेगा कि वह भाजपा और कांग्रेस के सोशल मीडिया हैंडल को पीछे छोड़ देंगे। यह युवक कहता है, “इसमें कुछ भी इरादतन नहीं था। यह आन्दोलन भारत के युवकों में बढ़ती हताशा दर्शाता है”। यही इसे मिला लोकप्रियता का असली कारण है। हताशा! भारत का युवक बढ़ती बेरोज़गारी, घटते मौक़ो, सरकारी और राजनीतिक उदासीनता, से परेशान और हताश है। और यह पीढ़ी इज़्ज़त चाहती है, यह नहीं चाहती कि उसकी लाचारी को ‘कॉकरोच’ कहा जाए।
देश में इस वक़्त लगभग 3 करोड़ पढ़ेलिखे बेरोज़गार हैं और अनुमान है कि 10 करोड़ ने नौकरी ढूँढना ही छोड़ दिया है। एक रिपोर्ट के अनुसार हमारे 67% ग्रेजुएट बेरोज़गार हैं जो 2004 में केवल 32% थे। एक एक सरकारी भर्ती के लिए हज़ारों युवक आवेदन देते हैं। चपरासी की सरकारी नौकरी के लिए एमबीए तक लाइन में खड़े हो जाते है। सरकारी आँकड़े बताते हैं कि यहाँ 15-29 आयु में 10% बेरोज़गारी है जो शहरी क्षेत्र में 13% है। जो अदृश्य बेरोज़गारी है वह और भी अधिक है। उसी वर्ग में सीजेपी की गूंज सुनाई दे रही है। उन्होंने ही अपमान को व्यंग्यात्मक प्रतिकार में बदल दिया है। इस आन्दोलन ने उन्हें भड़ास निकालने का मौक़ा दे दिया। जैसे किसी ने लिखा है, “जिन्हें सिस्टम ने कॉकरोच समझा हम उन्हीं की आवाज़ हैं”।
इसी वकत नीट-युजी पेपर लीक के स्कैंडल ने जलती में तेल डालने का काम किया। इसे गली सड़ी असंवेदनशील व्यवस्था का एक और प्रमाण समझ लिया गया। और लैपटॉप पर आग भड़क उठी। यह युवा पढ़े लिखे है। उन्हें मालूम हैं कि देश-विदेश में क्या हो रहा है। जिस दिशा में अपना देश चल रहा है उससे वह असंतुष्ट हैं। हम अपनी आर्थिक प्रगति का बहुत शोर मचाते हैं पर यह सच्चाई है कि चाहे हम 5वीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है, पर प्रति व्यक्ति जीडीपी में हम 150वें नम्बर पर हैं। हम बांग्लादेश से भी पीछे है। 80 करोड़ लोगों को यहाँ फ़्री राशन दिया जा रहा है। इसका मतलब है कि वह अपना पेट भी नहीं भर सकते। जो प्रगति हो रही है वह जा किधर रही है?लघु और मध्यम उद्योग कम क्यों हो रहें है? अमीर और गरीब में खाई क्यों बढ़ रही है? और अब तो एआई का जमाना सर पर है। पढ़े लिखों में बेरोज़गारी और बढ़ेगी। युवा देख रहें हैं कि चुनावों से कुछ नहीं बदलता। चुनाव दर चुनाव वह वहीं के वहीं हैं। एक चुनाव और दूसरे चुनाव के बीच संवाद क्यों रूक जाता है? प्रधानमंत्री ने हालात को देखते हुए किफ़ायत का उपदेश दिया है। शासक वर्ग पर एकाध दिन इसका असर हुआ। कोई दफ़्तर साइकल पर गया तो किसी ने ओटो ली तो किसी ने मैट्रो में सफ़र किया। फ़ोटो छप गए। उसके बाद सब वापिस पुराने क़ाफ़िलों में लौट आए।
उसके बाद सरकार ने एक बड़ी गलती कर दी। सीजेपी का वेबसाइट बंद करवा दिए। अर्थात् जो व्यंग्यात्मक आंदोलन है उसे सरकार ने खुद मान्यता दे दी। बेहतर होता कि इसे चलने दिया जाता। कुछ देर के बाद यह खुद शांत हो जाता। पर सरकार तो यह प्रभाव दे रही है कि वह इसे गम्भीरता से एक चुनौती की तरह ले रही है। ‘राष्ट्रीय सुरक्षा’ का मामला उठाया गया। हमारी राष्ट्रीय सुरक्षा इतनी कमजोर क्यों है कि एक व्यंग्यात्मक आंदोलन से उसे खतरा है?कुछ भाजपा नेताओं ने आरोप लगाया कि इसे पाकिस्तान से समर्थन मिल रहा है जबकि अभिजीत दीपके का कहना है कि 94% फ़ॉलोवर भारतीय हैं। उसे जान से मारने की धमकी दी जा रही है। 17 वर्ष के एक लड़के ने जब शिकायत की कि सीबीएसई की 12वीं की परीक्षा में उसकी उत्तर पुस्तिका बदल गई तो कुछ ने उसे ‘पाकिस्तानी’ करार दिया जबकि बाद में सीबीएसई ने मान लिया कि वास्तव में उसकी उत्तर पुस्तिका बदल गई थी।
हमारे देश में विरोध के प्रति बर्दाश्त ख़त्म क्यों हो रही है? ऐसा प्रतीत होता है कि एक ऑनलाइन सेना है जो विपरीत विचार या शिकायत पर गालियों की बौछार के लिए तैयार रहती है। ‘एंटी नैशनल’, ‘अर्बन नक्सल’, ‘दीमक’, ‘पाकिस्तानी’ बहुत कुछ कहा जाता है। इंदिरा गांधी भी बार बार विदेशी हाथ की शिकायत करती थी पर प्रमाण कोई नहीं दिया। कुछ लोग जॉर्ज सोरस के बारे कह रहें हैं कि वह यहाँ असंतोष बढ़ाने में लगा है। उसकी आयु 95 वर्ष है। मानना मुश्किल है कि इस 95 वर्ष के आदमी का ध्यान भारत में हो रही घटनाओं पर है या वह भारत को अस्थिर करना चाहता है। और अगर वास्तव में वह यहाँ गड़बड़ करवा रहा है तो यह हमारी व्यवस्था का बहुत घटिया चित्र प्रस्तुत करती है कि दूर अमेरिका में बैठा 95 वर्ष का व्यक्ति हमें अस्थिर कर रहा है।
हमारे पास एक मज़बूत सरकार है। एक लोकप्रिय प्रधानमंत्री हैं और एक दृढ़ गृहमंत्री है। फिर विरोध और असहमति से घबराहट क्यों? प्रभाव यह मिलता है कि सरकार आलोचना को पसंद नहीं करती जबकि असहमति तो लोकतंत्र की जान है। आलोचक को तो शुभचिंतक समझना चाहिए कि वह ग़लतियों के प्रति सावधान कर रहा है। कबीर जी भी कह गए हैं,
निंदक नियरे राखिए,आँगन कुटी छबाय। बिन पानी, साबुन बिना, निर्मल करे सुभाय
पर आज कल तो निंदक को बर्दाश्त ही नहीं किया जाता। उसकी राय के लिए उसे खदेड़ने की कोशिश होती है। पहली सरकारों के समय कार्टूनिस्ट को पूरी जगह दी जाती थी। लक्ष्मण और अबू जैसे कार्टूनिस्ट तो व्यंग्य को हथियार की तरह इस्तेमाल करते थे। किसी ने उन्हें जेल नहीं भेजा। न ही उन्हें एंटी-नैशनल कह कर गालियाँ निकाली गईं। पर अब तो बर्दाश्त ख़त्म हो गई लगती है। सोनम वांगचुक को छ: महीने एनएसए में जेल में रखा गया। लोकतंत्र केवल संस्थाओं के बल पर ही जीवित नहीं रहता। इसके लिए जोशीली सिविल सोसायटी और ग़ैर सरकारी संस्थाएँ चाहिए जिन में मीडिया की प्रमुख भूमिका होनी चाहिए। पर हमारा मीडिया तो कमजोर हो गया जिसकी गूंज विदेशों में भी सुनी जा रही है। अगर यहाँ मीडिया अपनी ज़िम्मेवारी निभाता तो ‘कॉकरोच’ जैसे आंदोलन की ज़रूरत ही नहीं उठती।
अगर मुख्य न्यायाधीश वह टिप्पणी न करते तो मामला ठप्प रहता। पर अब जबकि यह भड़क उठा है इसके पीछे हताशा को समझने की ज़रूरत है। यह कोई क्रान्ति नहीं है। न ही यह राजनीतिक चुनौती है। इन्होंने चुनाव नहीं लड़ना। ज़्यादा से ज़्यादा वह मुद्दे उठाते रहेंगे पर यह लोकतंत्र में जायज ही नहीं ज़रूरी भी है। भारत नेपाल या बांग्लादेश नहीं है जहां जैन-जैड तख्ता पलटने में सफल रही है। भारत में बहुत भिन्नता है। इतिहास बताता है कि 1857 की पहली आज़ादी की लड़ाई इसलिए असफल रही क्योंकि भिन्न जगहों से दिल्ली पहुँचे सैनिक एकजुट नहीं हो सके। पर यहाँ जैन-जैड कुछ परिवर्तन ज़रूर ला सकती है जैसे हमने तमिलनाडु में देखा जहां राजनीतिक दलों से निराश युवाओं ने दो साल में ही 88% हिन्दू प्रदेश में एक ईसाई फ़िल्म स्टार को सत्ता सौंप दी। पर सब लोकतान्त्रिक तरीक़े से हुआ।
हमारे लोग अराजकता को पसंद नहीं करते इसलिए सीजेपी से सत्ता को कोई ख़तरा नहीं है। न ही यह कोई साज़िश है। पर ऊँचा संदेश जरूर है कि युवाओं में बेचैनी और विराग बढ़ रहा है। मिडिल क्लास के युवा विशेषतौर पर असंतुष्ट हैं। अभिजीत दीपके ने कहा है, “हमारा अपराध केवल यह है कि हम अपने लिए बेहतर भविष्य की माँग कर रहें हैं”।कॉकरोच इस भावना का सिंबल बन गया है। वेबसाइट ब्लाक हो सकती है पर इस भावना को ब्लाक नहीं किया जा सकता। आसानी से 2 करोड़ फ़ॉलोवर नहीं जुड़ते। यह समझने की ज़रूरत है कि इतनी जल्द इन्हें इतना समर्थन क्यों मिला है? इनसे टकराव उल्टा पड़ेगा। इस पीढ़ी को हैंडल विद् केयर की जरूरत है।