मनमोहन सिंह का रेनकोट (Manmohan Singh’s Raincoat)

February 15, 2017 Chander Mohan 0

अमेरिका के 33वें राष्ट्रपति हैरी ट्रूमैन ने कहा था कि अगर आप ताप नहीं सह सकते तो रसोई में कदम मत रखो। अर्थात् अगर आप राजनीति में हैं तो आलोचना और यहां तक कि अपशब्द भी सहने की ताकत आप में होनी चाहिए। कुछ ऐसी ही बात पूर्व प्रधानमंत्री पीवी नरसिम्हा राव ने भी कही थी कि राजनीति में मोटी चमड़ी चाहिए और गालियां तक सहने को तैयार रहना चाहिए। इसलिए प्रधानमंत्री मोदी की पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह पर की गई टिप्पणी पर कांग्रेस का बवाल समझ नहीं आता। अपने प्रतिद्वंद्वियों पर हमला सब राजनीतिक दल करते हैं। विदेशों में भी होता है। कई जगह तो हमसे भी अधिक आक्रामकता और निम्न ढंग से होता है। यहां प्रधानमंत्री मोदी को […]

दो आरज़ू में कट गए, दो एटीएम की कतार में! (Do Arzoo Mein Kut Gaye Do Intzaar Mein)

December 13, 2016 Chander Mohan 0

नोटबंदी का एक महीना पूरा होने के बाद सबको अहसास है कि हालात सही नहीं चल रहे। बैंकों तथा एटीएम के आगे कतारें पहली जैसी लम्बी ही हैं। अपना पैसा निकालना ही पहाड़ जैसी मुसीबत बन गई है। जो 24,000 रुपए साप्ताहिक निकालने की अनुमति है वह भी नहीं मिल रहे। वेतन देना और लेना दोनों मुश्किल हो गया है। बैंकों के आगे झगड़े शुरू हो गए हैं। जब नोटबंदी की प्रधानमंत्री ने घोषणा की थी तो आम आदमी ने उत्साहित होकर समर्थन दिया था। लोगों का मानना था कि नरेंद्र मोदी ने भ्रष्टाचार तथा कालेधन के खिलाफ भी सर्जिकल स्ट्राईक की है। बेहतर भविष्य तथा अच्छे दिन की आशा में लोग तकलीफ सहने को तैयार थे। लेकिन यह तब […]

मुद्दत से आरजू थी कि सीधा करे कोई! (Someone has to set them right)

August 23, 2016 Chander Mohan 0

लाल किले से अपने भाषण में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा ब्लूचिस्तान, गिलगिट तथा पाक अधिकृत कश्मीर के लोगों का जिक्र करने को वाशिंगटन स्थित ब्लूच बुद्धिजीवी मलिक सिराज अकबर ने ‘एक गेम चेंजर’ कहा है अर्थात् खेल बदलने वाला। उनका कहना है कि ब्लूचिस्तान पाकिस्तान के प्रतिद्वंद्वियों के लिए तैयार है जो इस्लामाबाद की फजीहत करना चाहते हैं और उसका खून बहाना चाहते हैं। यह सज्जन बहुत आगे बढ़ गए लगते हैं। यह तो सही है कि प्रधानमंत्री के कथन से खेल बदल रहा है लेकिन प्रधानमंत्री के कथन का यह मतलब नहीं कि भारत वहां दखल देने जा रहा है। प्रधानमंत्री मोदी यह संदेश अवश्य दे रहें हैं कि पाकिस्तान के बारे वह लगभग वहां तक जाने को तैयार […]

उड़ता मोदी, उभरता भारत (Flying Modi, Rising India)

June 14, 2016 Chander Mohan 0

वही दुनिया है। वही देश है। पर दो सालों में रिश्ता किस कद्र बदल गया! प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की पांच देशों की 33000 किलोमीटर की यात्रा फिर स्पष्ट कर गई कि भारत अब विश्व राजनीति के केन्द्र में मज़बूती से स्थापित है। नरेन्द्र मोदी समझ गए कि दुनिया में सैनिक तथा आर्थिक ताकत बनने के लिए अमेरिका का सहयोग बहुत जरूरी है। अमेरिकी पूंजी, तकनीक तथा समर्थन के बिना भारत विश्व ताकत नहीं बन सकता। इसलिए वीज़ा न दिए जाने की व्यक्तिगत तकलीफ को एक तरफ रखते हुए उन्होंने अमेरिका तथा भारत के बीच वह घनिष्ठता बना दी जो पहले कभी देखने को नहीं मिली। बराक ओबामा ने भी बराबर की गर्मजोशी तथा उदारता दिखाई। दिलचस्प है कि 1974 में […]

Andhera gum ka pighulne ko he

May 26, 2015 Chander Mohan 0

अंधेरा गम का पिघलने को है! एक साल पूरा हो गया, अच्छे दिन नहीं आए। इतनी जल्दी आ भी नहीं सकते थे। शंघाई में प्रवासी भारतीयों को सम्बोधित करते हुए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कहा कि ‘दुख भरे दिन बीते रे भैय्या, सुख भरे दिन आयो रे।’ यह एकदम नहीं हो सकता था। नेतृत्व को अपने लोगों को न केवल ‘सुख भरे दिनों’ के लिए बल्कि मेहनत, तंगी, कुर्बानी के लिए भी तैयार रखना चाहिए कि अचानक परिवर्तन नहीं होगा। अगर इस सरकार के कामकाज का आंकलन करना है तो देखना होगा कि इनसे 12 महीने पहले हम कहां थे? हमारी तो हर नीति को लकवा मार गया था। मुद्रास्फीति 9 प्रतिशत पर थी और विकास दर कम होकर 5 […]

Ninduk Niyre rakhie -by Chander Mohan

February 17, 2015 Chander Mohan 0

‘निंदक नियरे राखिए’ व्यक्तित्व की राजनीति अंतहीन नहीं हो सकती। दिल्ली का चुनाव परिणाम पहली चेतावनी है कि प्रधानमंत्री तथा उनके साथियों को उनके इमेज मेकर्स द्वारा निर्मित लोकप्रियता की धारणा से अतिशीघ्र बाहर आ जाना चाहिए और इस हकीकत का सामना करना चाहिए कि लोग असंतुष्ट हैं। अगर वह नाराज़ नहीं तो निराश जरूर हैं। दिल्ली का चुनाव नरेन्द्र मोदी के अपराजेय होने का मिथक भी तोड़ गया इसलिए आगे राजनीतिक चुनौतियां बढ़ सकती हैं। पहली परीक्षा तो बजट अधिवेशन में होगी। फिर बिहार के चुनाव हैं। नेताओं को खुद से पूछना चाहिए कि जमीन पर जो चल रहा था उसे भांपने में वह क्यों असफल रहे? आप सब तो दिल्ली में बैठे थे, आपको पता क्यों नहीं चला […]