ट्रम्प की स्ट्राइक और हमारे नेतृत्व की परीक्षा, Trump Strike And Test For Our Leadership Trump

“मुझे फ़र्क़ नहीं पड़ता कि भारत रूस के साथ क्या करता है। वह अपनी डैड इकानिमी को मिल कर गिरा सकतें हैं”, भारत पर 25% +25% टैरिफ़ थोपते हुए अमेरिका के असंतुलित राष्ट्रपति डानल्ड ट्रम्प के यह कड़वे शब्द बहुत देर चुभतें रहेंगे और इनमें भारत और अमेरिका के रिश्ते को तबाह करने की पूरी क्षमता है। ऐसे कहा जा रहा है कि जैसे हम नार्थ कोरिया हों। सामरिक विशेषज्ञ डैरिक ग्रासमैन के अनुसार, “मई 1998 के बाद यह भारत और अमेरिका की सामरिक पार्टनरशिप के लिए सबसे बुरा दिन है”। इसी के साथ अमेरिका के राष्ट्रपति ने घोषणा की कि उन्होंने पाकिस्तान के साथ समझौता किया है और दोनों मिल कर पाकिस्तान के “विशाल तेल रिज़र्व” का विकास करेंगे। पाकिस्तान के साथ समझौते की घोषणा हमें चिढ़ाने के लिए की गई है क्योंकि अभी तक पाकिस्तान के कथित तेल रिज़र्व के बारे कोई हरकत नहीं है। भारत सरकार की प्रतिक्रिया सावधानीपूर्वक और परिपक्व रही है। कहा गया कि हम राष्ट्रीय हित में निर्णय लेंगे और रूस से रिश्ते समय की कसौटी पर खरे उतरें हैं। इन शब्दों के साथ भारत ने ट्रम्प की धौंस का संयमित जवाब देने की कोशिश की है। पर समस्या तो है। आख़िर अमेरिका दुनिया का सबसे ताकतवर देश है। उसके साथ बिगड़ते रिश्ते हमारे हित में नहीं हो सकते।

नरेन्द्र मोदी ने ट्रम्प के साथ अच्छा रिश्ता बनाने का बहुत प्रयास किया है। याद रखिए ‘अब की बार ट्रम्प सरकार’, पर अपने दूसरे कार्यकाल में अमेरिका के राष्ट्रपति की रवैया भारत विरोधी है। जिस पाकिस्तान को उनसे पहले राष्ट्रपति अछूत समझते रहे उसे ही ट्रम्प साथी बनाने में लगें हैं। वह देश जिसे दुनिया आतंकवाद का अड्डा जानती है और जो एक प्रकार से अंतराष्ट्रीय भिखारी है, वह कूटनीति में हमें मात कैसे दे गया? दक्षिण एशिया का शक्ति संतुलन जो हमारी तरफ़ झुका हुआ था को ट्रम्प उलटाने में लगें हैं। ट्रम्प के बदले रुख़ का कारण क्या है?  एक कारण है कि भारत सरकार उन्हें पाकिस्तान के साथ युद्ध विराम का श्रेय देने को तैयार नहीं। ट्रम्प लगभग अढ़ाई दर्जन बार कह चुकें हैं कि युद्ध विराम उन्होंने करवाया जबकि भारत सरकार का कहना है कि युद्ध विराम तब हुआ जब पाकिस्तान के डीजीएमओ ने इसकी याचना की। पाकिस्तान उसका श्रेय ट्रम्प को दे रहा है और उन्हें नोबेल सम्मान देने की सिफ़ारिश कर चुका है जो अहंकारी ट्रम्प को बहुत पसंद आई है जबकि भारत का कोरा जवाब था कि नोबेल पुरस्कार की बात व्हाइट हाउस से ही करें। पाकिस्तान में हमारे पूर्व राजदूत गौतम बम्बावाला ने माना है कि ट्रम्प की ईगो को खुश कर पाकिस्तान ने ‘अपने पत्ते सही चले हैं’।

हर्ष पंत जो अब्ज़र्वर रिसर्च फ़ाउंडेशन में विशेषज्ञ है का कहना है कि ट्रम्प इसलिए नाराज़ है क्योंकि भारत के साथ ट्रेड डील किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुँची। अमेरिका के वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट के अनुसार भी राष्ट्रपति ट्रम्प और उनकी सारी ट्रेड टीम ‘भारत के साथ ट्रेड वार्ता को लेकर हताश हैं’। भारत वह पहला देश था जिसने अमेरिका के साथ ट्रेड वार्ता शुरू की थी। शुरू में हमने टैरिफ़ घटा कर ट्रम्प को खुश करने के लिए कई रियायतों भी दी थीं। हम वहाँ से आयात, जिसमें रक्षा सामान भी शामिल हैं वह बढातें जा रहें हैं। इसी के कारण ट्रम्प भारत और मोदी को ‘फ्रैंड’ कहते रहे हैं पर अब 25% टैरिफ़ लगा दिया है और हमारी अर्थव्यवस्था को ‘डैड’ करार दिया। तीसरा बड़ा कारण है कि हम कृषि और डेयरी क्षेत्र को उनके लिए खोलने को तैयार नही है। हम उन्हें उस क्षेत्र में एंट्री नहीं दे सकते जिस पर हमारे लगभग 65 प्रतिशत लोग निर्भर हैं। अमेरिका में हर किसान को वार्षिक 26 लाख रूपए की सब्सिडी मिलती है जबकि हमारे एक किसान की औसत आय एक लाख रूपए से कम है। हम उनका मुक़ाबला कर ही नहीं सकते।

ट्रम्प की नाराज़गी का अगला कारण रूस है। राष्ट्रपति बनने से पहले ट्रम्प का दावा था कि बनने के बाद वह 24 घंटों में रूस और युक्रेन के बीच युद्ध रुकवा देगें। पर यह हो नहीं रहा क्योंकि पुतिन अपनी शर्तों पर अड़े हुए हैं। रूस पर दबाव डालने के लिए ट्रम्प हम पर दबाव डाल रहे हैं कि हम रूस से तेल लेना बंद कर दें और रक्षा सामान की ख़रीद कम कर दें। अमेरिका और उसके युरोपीय साथी कई बार भारत और चीन पर आरोप लगा चुकें हैं कि हम रूस से जो तेल और रक्षा सामान खरीदतें है उससे युक्रेन के खिलाफ रूस की युद्ध मशीनरी के लिए धन मिलता है। चीन क्योंकि बराबर की टक्कर है इसलिए उनका कुछ बिगाड़ नहीं सकते पर हमें जुर्माना लगाने की भी ट्रम्प ने धमकी दी है। रूस के तेल पर हमारी निर्भरता युक्रेन युद्ध से पहले 2% से बढ़ कर जून 2024 में 40% हो गई थी। उनका तेल सस्ता है और हमारा अधिकतर रक्षा सामान रूस से आता है। ब्रह्मोस मिसाइल जो आपरेशन सिंदूर के दौरान इतनी सफल रही है, भी रूस के साथ पार्टनरशिप में यहाँ बनती है।

हम रूस से अलग हो ही नहीं सकते, और न ही अमेरिका जैसे अविश्वसनीय देश के पाले में जा सकते है। हमारी लीडरशिप के लिए यह न केवल बड़ी चुनौती है बल्कि परीक्षा भी है। लोग इंदिरा गांधी को याद करते हैं कि वह निक्सन के आगे डटी रहीं। इस सरकार की यह भी समस्या है कि वह  प्रदर्शित करते रहे कि मोदी और ट्रम्प बहुत घनिष्ठ मित्र हैं। जिसे गोदी मीडिया कहा जाता है उसने देश का बहुत अहित किया है। जो मोदी और ट्रम्प के बीच ‘केमिस्ट्री’ को लेकर गद्गद हो रहे थे उन्होंने देश को गुमराह किया है। लोकराय बिल्कुल अमेरिका विरोधी हो चुकी है क्योंकि लोग समझतें हैं कि हमसे विश्वासघात हुआ है। अगर सरकार कुछ समझौता करने की कोशिश भी करेगी उसे लोग समर्पण समझेंगे।

डानल्ड ट्रम्प की सोच में केवल ताक़त का महत्व है, न सद्भावना का है, न किसी गठबंधन का है। अंतराष्ट्रीय परिदृश्य अचानक हमारे लिए अप्रिय हो गया है। हमारा कोई दोस्त नज़र नहीं आरहा। हमारे विकल्प सीमित हैं। प्रधानमंत्री मोदी ने कहा है कि किसी देश नें हमें आपरेशन सिंदूर से नहीं रोका ,पर यह भी कड़वी सच्चाई है कि किसी देश ने खुल कर हमारा समर्थन नहीं किया और न ही पाकिस्तान की निंदा ही की है। हमारे छोटे छोटे पड़ोसी देश भी तमाशा देखते रहे। एक तरफ़ चीन सीमा पर फुँकार रहा है तो दूसरी तरफ़ अमेरिका ने  पाकिस्तान के सौ खून माफ़ कर दिए गए हैं। अमेरिका का कुल घाटा 1200 अरब डालर है जिसमें हमारा योगदान केवल 40 अरब डालर का है। अर्थात् इस टैरिफ़-स्ट्राइक का सम्बंध केवल अर्थव्यवस्था से ही नहीं है। यह सामरिक और राजनीतिक स्ट्राइक भी है।

दबाव के नीचे झुकना हमारे लिए कोई विकल्प नहीं है। ट्रम्प हमारी आर्थिक, विदेश नीति और सामरिक स्वायत्तता समाप्त करना चाहते है। ब्राज़ील, कैनेडा और दक्षिण अफ़्रीका जैसे देशों ने झुकने से इंकार कर दिया है। रूस से हमें अलग करने का अशिष्ट प्रयास हमारी सामरिक प्रतिष्ठा पर चोट है। जैसे डा.मनमोहन सिंह के मीडिया सलाहकार संजय बरूआ ने लिखा है ‘1971 के बाद पहली बार पाकिस्तान को लेकर अमेरिका और चीन एक ही तरफ़ हैं’। यह अधिक देर नहीं रहेगा क्योंकि चीन जिसने पाकिस्तान में अरबों डालर का निवेश किया है चुपचाप अमेरिका और पाकिस्तान में बढ़ती घनिष्ठता बर्दाश्त नहीं करेगा। हमें अब अमेरिका पर निर्भरता कम करनी होगी और दूसरे बाज़ार ढूँढने पड़ेंगे। यह आसान नहीं होगा। पूर्व विदेश सचिव श्याम सरन ने लिखा है, “ट्रम्प के प्रतिरोध करने की क़ीमत चुकानी पड़ सकती है पर हमें इसके लिए तैयार रहना चाहिए”। स्पष्ट संदेश जाना चाहिए कि बंदूक़ की नोक पर समझौता नहीं हो सकता, न होगा। नरेन्द्र मोदी के लिए यह चुनौती ही नहीं अपना नेतृत्व और मज़बूत करने का मौक़ा भी है।

अंत में: भारत को अपमानित करने के लिए डानल्ड ट्रम्प ने हमें डैड इकानिमी कहा है। हम दुनिया की चौथी सबसे बड़ी 4 ट्रिलियन डालर की अर्थव्यवस्था है और कुछ महीनों में हम जापान को पछाड़ कर तीसरी बड़ी अर्थव्यवस्था बन जाएँगे। लेकिन ट्रम्प साहिब को हमारी अर्थव्यवस्था मुर्दा नज़र आती है। एनडीटीवी ने कई अमेरिकी ऐआई सिस्टम से सवाल किया कि ‘क्या भारत की अर्थव्यवस्था डैड है?’ जवाब बड़े दिलचस्प हैं,

     *चैटजीपीटी— भारत की अर्थव्यवस्था डैड से बहुत दूर है। यह गतिशील और शक्तिमान है।

     *ग्रौक— नहीं यह मुर्दा नहीं है। यह वैश्विक स्तर पर सबसे तेज अर्थव्यवस्था में से एक है।

     *जेमिनी— मज़बूत विकास है।

     *मैटा—भारत वैश्विक स्तर पर सबसे तेज विकास करने वाली बड़ी अर्थव्यवस्था है।

     *कोपायलेट— मरने से बहुत दूर यह तो उलट तेज विकास कर रही है।

अफ़सोस है कि अमेरिका के राष्ट्रपति को अपनी विशाल ईगो में यह नज़र नहीं आता। पर अफसोस इतना ही नहीं। हमारे देश में भी चन्द लोग हैं जो ट्रम्प से सहमत है। इनमें प्रमुख हैं विपक्ष के नेता राहुल गांधी। लोकसभा में प्रधानमंत्री मोदी को यह चुनौती देने के बाद कि वह कहें कि ‘डानल्ड ट्रम्प तुम झूठे हो’, राहुल गांधी ने सदन के बाहर कह दिया कि डानल्ड ट्रम्प सच कह रहें हैं कि ‘इंडियन इकानिमी इज़ डैड’। उनका कहना था कि प्रधानमंत्री और वित्त मंत्री को छोड़ कर सारे जानते हैं कि हमारी अर्थव्यवस्था मुर्दा है। इस टिप्पणी की जितनी भी निन्दा की जाए कम है। राहुल गांधी सैल्फ गोल करने के आदी हैं। जब जब देश उन्हें गम्भीरता से लेने लगता है वह ऐसा कुछ कर बैठतें है, या कह देते हैं कि पुनर्विचार करना पड़ता है।

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About Chander Mohan 810 Articles
Chander Mohan is the grandson of the legendary editor of Pratap, Mahashya Krishan. He is the son of the famous freedom fighter and editor, Virendra. He is the Chief Editor of ‘Vir Pratap’ which is the oldest hindi newspaper of north west india. His editorial inputs on national, international, regional and local issues are widely read.