पंजाब को मरहम चाहिए,छेड़खानी नहीं, Punjab Needs Balm Not Irritants

 यह सरकार कदम वापिस लेने के लिए जानी नहीं जाती। पर अगर कृषि से सम्बन्धित तीन क़ानून वापिस लेना भी शामिल किया जाए, तो पंजाब सम्बंधित तीन बड़े कदम इस सरकार ने वापिस लिए हैं। यह अच्छी बात भी है। लोकतंत्र में अलोकप्रिय कदम वापिस लेना समझदारी और संवेदनशीलता दिखाता है। पर सवाल तो है कि इस समय जबकि पंजाब भीषण बाढ़ से गुजरा है, आर्थिक हालत नाज़ुक है और प्रदेश गुरू तेगबहादुर के 350वें शहीदी दिवस से सम्बंधित समागमों में व्यस्त है, एक के बाद एक ऐसे कदम उंठाए ही क्यों गए? पंजाब एक बार्डर स्टेट है जिसके लोगों का संघर्ष का लम्बा इतिहास है। यहाँ लोगों से संवाद किए बिना छेड़खानी की गुंजाइश नहीं होनी चाहिए। कृषि सम्बंधी कानून लाते समय भी ग़ज़ब का प्रशासनिक अहंकार और लापरवाही दिखाई गई थी। अब फिर वही गलती कीं गई है। पंजाब को ठीक तरह से समझने में बार बार इतनी नासमझी क्यों दिखाई जा रही है?

पहले चंडीगढ़ स्थित पंजाब यूनिवर्सिटी के संचालन में परिवर्तन लाने का प्रयास किया गया। लाहौर में इसकी स्थापना 1882 में हुई थी जहां अभी भी पंजाब यूनिवर्सिटी है। स्वतंत्र भारत में पंजाब यूनिवर्सिटी की स्थापना चंडीगढ़ में हुई जहां इसका खूबसूरत कैम्पस है। यह पंजाब की सबके पुरानी और प्रतिष्ठित यूनिवर्सिटी है। पंजाब को शिक्षित करने में इसका बड़ा योगदान है।पंजाबियों का उससे भावनात्मक जुड़ाव भी है। मैं भी यहाँ से पढ़ा हूँ और मेरे माता -पिता भी लाहौर में इस यूनिवर्सिटी के स्टूडेंट रहें हैं। अक्तूबर में इस यूनिवर्सिटी की स्वायत्तता पर चोट करते हए केन्द्रीय सरकार ने इसके सेनेट के चुनावों में भारी परिवर्तन कर दिया था। सेनेट के सदस्यों की संख्या 91 से घटा कर 31 कर दी गई थी। प्रभाव यह गया कि केन्द्र की सरकार विश्वविद्यालय की आज़ादी ख़त्म कर अपना कंट्रोल करना चाहती है। इस पर भारी प्रतिक्रिया हुई। बडा छात्र आंदोलन हुआ। दो यूनिवर्सिटी बंद करनी पड़ी। 27 दिनों के प्रदर्शन ने पंजाब के राजनीतिक और समाजिक वर्ग, भाजपा को छोड़ कर, को एक मंच पर केन्द्र के विरूद्ध इकट्ठा कर दिया। और केन्द्र को कदम वापिस लेने पर मजबूर कर दिया। नेपाल में जेन- ज़ैड के प्रदर्शन के बाद वैसे भी आजकल सरकारें छात्र असंतोष से घबराती हैं।

 नए चुनाव की घोषणा कर दी गई है और अब यह 91 सीटों के लिए ही होंगे। आशा है कि स्टूडेंट्स पर जो एफ़आइआर और केस दर्ज किए गए हैं वह भी वापिस ले लिए जाएँगे। दुनिया के सबसे प्रसिद्ध विश्वविद्यालयों को स्वायत्तता मिली हुई जिस कारण वह सही शिक्षा दे रहें हैं। सोचने और अभिव्यक्ति की आज़ादी को प्रोत्साहित किया जाता है। हमारे देश में चाहे वह जेएनयू हो या पंजाब यूनिवर्सिटी हो या बनारस हिन्दू यूनिवर्सिटी, यह सब अपनी शैक्षणिक आज़ादी के लिए जानी जाती है। हार्वर्ड या केम्ब्रिज या ऑक्सफ़ोर्ड विश्वविद्यालय इसलिए इतने मशहूर हैं क्योंकि यहाँ सोचने और बोलने की आजादी है। हर हुक्मरान को ऐसी आजादी चुभती है। डानल्ड ट्रम्प ने भी हार्वर्ड पर धावा बोल दिया था। उसकी केन्द्रीय फ़ंडिंग रोक दी थी। ऐसे लोग समझते नही कि अगर सोचने के अधिकार पर पैहरा बैठा दिया गया तो देश की तरक़्क़ी बाधित हो  जाएगी।

अभी पंजाब यूनिवर्सिटी वाला मामला ठंडा भी नहीं हुआ था कि केन्द्र ने एक और बड़ा कदम उठाने की मंशा प्रकट कर दी जिससे पंजाब में तूफ़ान खड़ा हो गया। मामला चंडीगढ़ से सम्बंधित था। लोगों के दबाव में यह कदम भी वापिस ले लिया गया पर यह उठाया ही क्यों गया, यह जानते हुए कि चंडीगढ़ के साथ पंजाबियों का भावनात्मक रिश्ता है? वह इसकी संवैधानिक हैसियत में कोई भी परिवर्तन, जो पंजाब से इसका रिश्ता कमजोर करता हो, को पसंद नहीं करेंगे।  जिसे ‘सिटी ब्यूटीफ़ुल’ कहा जाता है, यह नया शहर जवाहरलाल नेहरू की उन लोगों के लिए सौग़ात थी जिन्हें देश का विभाजन ज़ख़्मी छोड़ गया था। नेहरू जी ने उनके दर्द को समझा था। उनकी राजधानी लाहौर पाकिस्तान में रह गई थी। चंडीगढ़ लाहौर तो नहीं है क्योंकि वह इतिहास नहीं हो सकता, पर यह एक ऐसा शहर है जिस पर हम नाज़ कर सकतें है। केन्द्रीय शासित होने के कारण चंडीगढ़ पर पैसा भी ख़ूब बहाया जाता है। पंजाब के बाक़ी जर्जर शहरों और चंडीगढ़ के बीच तो ज़मीन आसमान का अंतर है।

चंडीगढ़ लाहौर की इवज में पंजाब को दिया गया था। प्रसिद्ध स्विस- फ़्रेंच आर्किटैक्ट ला कार्बूज़िए को बुला कर नेहरू जी ने खुद दिलचस्पी लेकर इसका निर्माण करवाया था। कई शायर पर इसकी वास्तुकला की आलोचना कर चुकें हैं। एक सज्जन जो हमें पढ़ाते थे, ने कविता लिख कर शिकायत की थी कि यह ‘पत्थरों का शहर है,पत्थर दिलों का शहर है’। तब से लेकर चंडीगढ़ बहुत बदल गया है पर दुर्भाग्यपूर्ण है कि इसके अस्तित्व को लेकर विवाद जुड़ गया है जिसका समाधान नज़र नहीं आ रहा। केन्द्र के वर्तमान कदम ने इस सोए हुए मामले को फिर से भड़का दिया है। जब इसे पंजाब के लिए बनवाया गया थे तो यह वह पंजाब था जो अमृतसर से लेकर दिल्ली तक फैला हुआ था। मनाली और रोहतांग दर्रा तक पंजाब का हिस्सा था। जब 1966 में पंजाब का भाषा के नाम पर विभाजन किया गया और आधा इलाक़ा बाहर निकाल दिया गया, चंडीगढ़ को पंजाब और हरियाणा की संयुक्त राजधानी घोषित कर दिया गया। तब यह सोच थी कि हरियाणा अपनी राजधानी, शायद रोहतक में, बना लेगा और चंडीगढ़ केवल बाक़ी बचे पंजाब की राजधानी बनी रहेगा। पर छह दशकों से मामला लटकता आ रहा है।  

चंडीगढ़ से सांसद मनीष तिवारी ने लिखा है, “लाहौर छिन जाने के बाद चंडीगढ़ को सदा ही पंजाब की राजधानी के तौर पर देखा गया था…यह सांस्कृतिक और भाषाई हक़ीक़त है जिसे दूर नहीं किया जा सकता”।चंडीगढ़ को कभी भी केन्द्रीय शासित शहर के तौर पर सोचा नही गया था। यह पंजाब के लिए बनाया गया शहर है। जब 1966 में इसे यूनियन टैरेट्री बनाया गया तो यह अस्थायी प्रबंध था। वर्तमान केन्द्रीय सरकार ने चंडीगढ़ का मामला चुपचाप बिना सलाह मशविरा किए, तय करने की कोशिश की थी। प्रयास था कि क़ानून में संशोधन कर चंडीगढ़ को संविधान के अनुच्छेद 240 के अंतर्गत लाया जाए जैसे दूसरे केन्द्रीय शासित प्रदेश हैं। संसद में इस आशय के लिए विधेयक लाने की तैयारी शुरू हो गई थी जिसे शोर मचने के बाद अब रद्द कर दिया गया है। अगर यह क़ानून बन जाता तो पंजाब का बचा खुचा सम्बंध भी टूट जाता और यह शहर बाक़ी यूटी की तरह लै.गवर्नर के अधीन आ जाता। 2016 में भी ऐसा ही प्रयास किया गया था। पंजाब के राज्यपाल की भूमिका को ख़त्म कर प्रशासक लगाने का प्रयास किया गया जिसे भी अब की तरह वापिस लेना पड़ा था।

यह कदम वापिस लेना समझदारी है। हैरानी है कि पंजाब के इतिहास और लोगों की संघर्षशील मानसिकता को समझने में इतनी भूल की गई। पूर्व मुख्यमंत्री कैप्टन अमरेन्द्र सिंह जो आजकल भाजपा में हैं ,ने भी शिकायत की है कि “केन्द्र पंजाब को ठीक तरह से समझता नहीं”। आज की स्थिति में पंजाब को छेड़खानी की नही मरहम की ज़रूरत है, जो नहीं लगाई जा रही। बाढ़ के बाद प्रधानमंत्री ने 1600 करोड़ रूपए देने की घोषणा की थी। पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान की शिकायत है कि यह पैसा भी पंजाब को नहीं दिया गया। और जो पैसा आया है वह भी सामान्य सरकारी योजनाओं का पैसा है जो बाढ़ न आती तो भी मिलता। केन्द्रीय मंत्री रवनीत सिंह बिट्टू का कहना है कि 800 करोड़ रूपया भेजा जा चुका है। मुझे मालूम नहीं कि सही स्थिति क्या है पर पंजाब में यह प्रभाव फैल गया है कि केंद्र सरकार अगर भेदभाव नहीं कर रही, तो सहयोग भी नहीं कर रही। पंजाब सीमावर्ती प्रदेश है जहां पाकिस्तान साज़िश करता रहता है। आगे भी कर सकता है। ऐसी साज़िशों का मुक़ाबला प्रदेश की अंदेखी कर नहीं किया जा सकता। बार्डर स्टेट होने के कारण पंजाब की अपनी विशेष ज़रूरतें हैं जिनका ध्यान रखा जाना चाहिए। पंजाब आज अरूणाचल प्रवेश के बाद सबसे अधिक क़र्ज़ में डूबा प्रदेश है। प्रदेश की देनदारी 378453 करोड़ रूपए है। जो क़र्ज़ा लिया जाता है उसका 70% क़र्ज़ पर ब्याज देने पर खर्च होता है। लोक कल्याण की योजनाओं पर खर्च करने के लिए बहुत कम पैसा बचता है। प्रदेश देश के कोने मे स्थित है जिस कारण निवेशक की यहाँ पैसा लगाने में दिलचस्पी नहीं है। बार बार धरनों और हाईवे रोकने से भी पंजाब की छवि बिगड़ चुकी है। चिट्टे ने एक पीढ़ी को बर्बाद कर दिया है।वर्तमान सरकार इससे ख़त्म करने की कोशिश तो कर रही है पर पिछली सरकारें ड्रग्स के प्रति इतनी उदार और लापरवाह रहीं है कि इस कुख्यात धंधे की जड़ें बहुत गहरी हैं।

अंत में: कई बार सोचता हूँ कि अगर पंजाब का 1966 में विभाजन न होता तो क्या होता? हरियाणा जो संयुक्त पंजाब में बहुत पिछड़ा इलाक़ा था, आज देश के सबसे तेज प्रगति करने वाले प्रदेशों में है। दिल्ली के साथ उसकी निकटता के कारण हरियाणा को बहुत लाभ हुआ है जबकि पंजाब लगातार पिछड़ता जा रहा है। जीडीपी में पंजाब का नम्बर 16वां है जबकि कभी नम्बर 1 हुआ करता था। अगर पंजाब संयुक्त रहता तो चंडीगढ़ का विवाद भी न उठता। पंजाबी दिल्ली तक पढ़ाई जाती। गुरुग्राम और फ़रीदाबाद जैसे चमकते और राजस्व पैदा करने वाले शहर हमारे होते। हमारे 23 सांसद होते। दिल्ली में हमारी कदर होती।

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About Chander Mohan 798 Articles
Chander Mohan is the grandson of the legendary editor of Pratap, Mahashya Krishan. He is the son of the famous freedom fighter and editor, Virendra. He is the Chief Editor of ‘Vir Pratap’ which is the oldest hindi newspaper of north west india. His editorial inputs on national, international, regional and local issues are widely read.